भक्तिका नशा या नशे की भक्ति
* ऐसी लागी लगन ,मीरा हो गयी मगन...
* हरी -हरी हरी गुण गानें लगी ...
श्री अनूप जलोटाजीका इस तरह का भजन भक्तिके नशेका चित्रण करता है ।
** और **
आये दिन शिव रात्रि , होली ,दिवाली और दशहराके मनाये जा रहे उत्सवोंकी झांकियों में आप अपनी स्थितिको भी देखते ही होंगे जो चन्द घड़ियोंकी उम्र ले कर आता है , यह है नशें में भक्ति का चित्रण । मीरा मथुरा से द्वारका तक पैदल गाती हुयी और नाचती हुयी अपनीं मस्ती में चलती रही , एक तूफ़ानकी भाँति ,एक चक्रवातकी तरह । जो भी मीराके उर्जा क्षेत्र में आया ,मीरा बन गया , जिसके पीठ पीछे कहीं दूर रह गया ,यह माया मोहित संसार और कन्हैयाकी ऊर्जा में डूबा वह भक्ति के नशे में मायातीत एवं कालातीत हो गया ।
* भक्तिकी नशा में डूबा यह नहीं पूछता ,अपनें साथी से कि भाई ! टाइम क्या हुआ होगा ? और नशेकी भक्तिका नकली भक्त बार -बार अपनीं घडी देखता रहता है ।
*भक्ति का नशा देखनें वाले दुर्लभ हैं और नशे की भक्ति वालों से यह संसार रसातल की ओर सरकता जा रहा है ।
~~ ॐ ~~
Thursday, December 18, 2014
भक्ति का नशा या नशे में भक्ति
Wednesday, December 10, 2014
क्या कर रहे हैं ?
सुलझी हुयी गुत्थीको कहीं
उलझा तो नहीं रहे ?
लोगों को दबानें में कहीं
खुद तो नहीं दबाते जा रहे ?
सोनें के सिंघासन की सोच में
कहीं अपनीं खाट को तो नहीं भूल रहे ?
लोगोंकी नक़ल करते -करते
कहीं स्वयं को तो नहीं भूलते जा रहे ?
~~ हर हर महादेव ~~
Saturday, November 22, 2014
यहभी एक जगह है
विन्ध्याचल और कैमूर पहाड़ों के मध्य ,गंगा और सोन नदियों के मध्य बसा हुआ सोनभद्र जिला है । यह जिला मिर्ज़ापुर जिले का एक भाग हुआ करता था ।
* यह वह जगह है जहाँ लगता है प्रकृति पूर्ण रूप से इसी भू भाग पर उतरी हो , यहाँ परमात्मा सबकुछ दे रखा है लेकिन यह प्रकृति का आँचल राजनीति में बिष में धीरे - धीरे अपना रूप -रंग खोता जा रहा है ।
* यह वह क्षेत्र है जहाँ बच्चे बच्चों को पैदा कर रहे हैं और बूढ़े इज्जत बचाने में झुकते जा रहे हैं ।
* यह वह क्षेत्र है जिसकी तकदीर उपरवाले नें सोनें की कलम से लिखी थी पर सत्ताधारियों नें परमात्मा की लेखनी को बदल दिया ।
* यह वह जगह है जहाँ पालक से ज्यादा पान की पत्तियाँ बिकती हैं ।
* यहाँ राज नेता आते रहते हैं लेकिन सड़क मार्ग से नहीं हवाई मार्ग से क्योंकि जब वे यहाँ की प्यासी धरती माँ की कराह सुन न सके बस समझो की हवा की भाँति आये और गए ।
* कांग्रेस , भारतीय जनता पार्टी , समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सब लोगों को यहाँ की जनता सर पर बैठाई थी , अच्छे दिन की उम्मीद में पर यहाँ के दिन धीरे- धीरे अँधेरे में बदलते चले गए ।
<> अब यह कहा जा सकता है कि सारी दुनियाँ बदल सकती है पर सोनभद्र वैसे का वैसा बना रहेगा <>
~~~ ॐ ~~~
Tuesday, November 18, 2014
दो बूँद आँसू
उनकी आखिरी बात थी ," क्या बताऊँ बेटा , अपनें जीवनका अनुभव और मेरे अनुभव से तुमको मिलेगा भी क्या , अभीं संसार तुमनें कदम ही तो रखा है ? सब्र रखो , धीरे - धीरे संसार तुमको भी डुबो लेगा और तुम्हे तब पता चलेगा कि तुम डूब चुके हो जब निकलनें के सभीं उपाय समाप्त हो चुके होंगे , यही एक गहरा राज गई ,इस संसार का ।
* इंसान आँखें बंद किये सारा जीवन गुजार देता है और जब उसकी आँखें खुलना चाहती है तब खुल नहीं पाती और वह बिचारा , तड़पता हुआ आखिरी श्वास भरता है ।
* जिसका कद दुनिया वालोंके लिए लम्बा दिखता
है ,उस बिचारेका वही कद उसके घर वालोंके लिए एक चीटी के कद से ज्यादा बड़ा नहीं होता । घर में उसकी श्वासें रुक -रुक कर चलती है और ज्योंही उसे मौक़ा मिलता है ,वह घर से बाहर निकल भागता है ।
* रामू काका ज्यादा तो बोल न सके पर जो बोल न सके , उसे उनकी चुप्पी ब्यक्त कर रही थी । * रामू काका बोलते -बोलते एकाएक चुप हो गए , हमें देखते रहे ,दो - एक घडी और हमेशाके लिए बंद हो रही उनकी आँखे दो बूँद आँसू टपकाते हुए सबकुछ कह गयी जिनको समझनें में ही जीवनका राज छिपा दिख रहा है ।
~~~ ॐ ~~~
Tuesday, October 21, 2014
सोनभद्र की कहानी उसकी जुबानी
^^ सोनभद्र पुर्वाञ्चलका एक नया जनपद जो प्रकृतिका माइका सा है और जो गंगा - सोन दो
बड़ी -बड़ी नदियोंके मध्य बसे हुए होनें पर भी प्यासा है । मैं पिछले 60 साल से इस क्षेत्रको देख रहा हूँ ,यहाँ कौन -कौन से लोग नहीं आते -जाते लेकिन जो आते हैं लगते तो हैं अवतारी पर निकलते हैं महान लुटेरे ।
^^ यहाँ क्या नहीं है ? और क्या है ?
* यह क्षेत्र प्रकृतिका माइका है अतः यहाँ क्या नहीं है का अंदाजा लगाना संभव नहीं । यह क्षेत्र प्रकृति का कुबेर है जहाँ सीमेंट ,अलमुनियम,कोयल , बिजली एवं अन्य प्राकृतिक संपदाओंका अपार भण्डार है पर यहाँ जो लोग रहते हैं , उनके लिए कुछ नहीं है एक पान -सुपाड़ी और तंबाकू को छोड़ कर ।
* यहाँ के लोगों का दिन तम्बाकू के सहारे , रात स्वप्न के सहारे और जीवन मृत्युके इन्तजार में कटता है ।
## कुछ और बातें अगले अंक में ##
~~~ ॐ ~~~
Sunday, October 19, 2014
द्विज शब्द क्या कहता है ?
Tuesday, October 7, 2014
है तो समझदार पर ...
Friday, September 19, 2014
क्या करूँ ? ये सुनते ही नहीं
Wednesday, September 10, 2014
जीवनको स्वप्न आधारित न होनें दो
Wednesday, September 3, 2014
भीगे नैना -1
Tuesday, July 22, 2014
जंगल राज्य
● भूख चाहे पेट की हो या काम की , यह मनुष्य को जानवर बना सकती है ।
° जंगल में किसी के बनाए नियम नहीं चलते ,वहाँ के नियम प्रकृतिके नियम हैं जहाँ न कोई अपना है न पराया ,सब प्रकृतिके नियमका पालन कर रहे हैं और उनको इसके करनें में कोई दिक्कत भी नहीं ।
° जंगल में जो हैं उनके अन्दर कभीं यह बात नहीं आयी कि अमुक नियम अब पुराना हो चूका है ,अव उसमें सुधार की जरुरत है । सृष्टिके प्रारम्भ से आज तक प्रकृति जो नियम चला रही है , सब उस नियम के आधार पर जी रहे हैं , उन्हें कोई आपति नहीं ।
* प्राचीन युगों में जब मनुष्य में ज्ञान की ऊर्जा बहनें लगती थी तब वह देर नहीं करता था ,चाहे वह राजा हो या रंक , तुरंत उसका मुह जंगल की ओर हो जाता था , जानते हैं ऐसा क्यों होता था ? क्योंकि जंगल में जो घटित होता है , वह प्रकृतिके अनुकूल होता है और बस्ती में जो घटित होता है वह मनुष्य के भोग बुद्धि पर आधारित होता है ।प्रकृति निर्मित नियम परम सत्य के नियम हैं , मनुष्य द्वारा निर्मित नियम सत्य आधारित नहीं तर्क आधारित होते हैं और तर्क संदेह आधारित है ।
* Logic यानी तर्क आज के विज्ञान की जननी है ; जितना गहरा तर्क होगा , इससे उतना गहरा विज्ञान निकलता है । आज का युग तर्क का युग है ,आज तर्क शास्त्री हर क्षेत्र में ऊपर हैं । तर्क अर्थात संदेह ,जितना गहरा संदेह होगा , उतना गहरा विज्ञान उससे विज्ञानं निकलेगा और जब संदेह भ्रान्ति में बदल जाता है तब विज्ञानके मजबूत नियम निकलते हैं । * जंगल में प्रकृति है और प्रकृति में जंगल हैं जहाँ प्रकृति और उसके नियम स्पष्ट दिखते हैं । प्रकृति को देखना मनुष्य को द्रष्टा बनानें में सहयोग करती है और प्रकृति का द्रष्टा ब्रह्ममय होता है ।
* अब आप सोचिये कि जंगल राज्यके सम्बन्ध में आप की अपनी सोच क्या है ?
~~ ॐ ~~