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Monday, July 14, 2014

दो शब्द

** आँखें - भाग - 1 ** 
● दो बातें जो यहाँ नीचे दी जारही हैं उनको ध्यानसे समझें :--- 1-<> मनुष्यकी आँखे उसके अन्दर छिपे भाव सागरके द्वार हैं । 2 -<> मनुष्य की आँखे उसके हृदय के द्वार हैं । 
^^ ऊपर दी गयी दो बातों में दम है और इनकी समझ बुद्धि - योगमें प्रवेश कराती है , कैसे ? देखते हैं यहाँ इन दो बिषयों को ? <> क्या है ,बुद्धि योग ? <> 
* गीता - 2.49 के माध्यम से प्रभु कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं :-# बुद्धि योग से कर्म निम्न श्रेणीका है अतः तुम बुद्धि योग की शरण में पहुँचो ।गीता को कर्म योगका आधार समझा जाता है और कृष्ण यहाँ उसे निम्न स्तरका कह रहे हैं , कुछ देर यहाँ रुकें और इस बात की जड़ को बुद्धि माध्यम से समझें ........ । 
* अर्जुन मोह ग्रसित है और मोह में बुद्धि चालाक बन जाती है । बुद्धि बचाव केलिए कोई कसर नहीं छोडती।अर्जुन प्रभुकी इस वात को सुन कर चुप रहते हैं और तीसरे अध्याय के प्रारम्भ में जाकर अर्जुन पुनः ( गीता -3.1 ) इस बात के सन्दर्भ में पूछते
 हैं , " यदि कर्म से उत्तम बुद्धि है तो आप मुझे कर्म के लिए क्यों प्रेरित कर रहे हैं ? " ऊपर ऊपर से देखनें पर अर्जुन का प्रश्न स्वाभाविक दिखता है । 
* आँख से टपकते आँसूओं के दो श्रोत होते हैं , एक श्रोत है मोह और दूसरा श्रोत है भक्ति । 
* मोह और भक्तिकी आँसुओंके सम्वन्ध में देखेगें अगले अंक में । ~~ ॐ ~~