Wednesday, March 25, 2026

उत्तराखंड में स्थित तीन दिव्य ऊर्जा क्षेत्र



उत्तराखंड के तीन पवित्र तीर्थ जहां की ऊर्जा सीधे समाधि में पहुंचाती है👇


तीर्थ

विवरण

कसार देवी

समुद्रतल से 

ऊंचाई 2100 m 

अल्मोड़ा  से लगभग 8 किमी दूर कसार देवी गाँव की कश्यप पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। Swami Vivekananda 1890 में यहाँ ध्यान करने आए थे। 

जागेश्वर

समुद्रतल से ऊंचाई

~ 1870 m

यह अल्मोड़ा से लगभग 35 किमी दूर

घने देवदार जंगलों के बीच स्थित +124 मंदिरों का समूह  मार्ग ⤵️

अल्मोड़ा → आर्टोला → जागेश्वर

पताल भुवनेश्वर

समुद्रतल से ऊंचाई

1350 m 

यह पिथौरागढ़ में गंगोलीहाट से 15 किमी दूर स्थित है गुफा में स्थित है।

मार्ग :01: 100 किमी 

पिथौरागढ़ → थल → गंगोलीहाट → पाताल भुवनेश्वर  

मार्ग : 02 : 120 किमी 

 अल्मोड़ा → बागेश्वर → गंगोलीहाट → पातालभुवनेश्वर 

ऊपर व्यक्त तीन तीर्थ में ध्यान शीघ्रता से घटित होने लगता है और ध्यान की उच्च भूमि मिलते ही समाधि भी घटित हो जाती है। इन पवित्र तीर्थोंकी यात्रा प्रारंभ करने से पहले इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइड में वैज्ञानिकों द्वारा ध्यान में डूबे साधक के मस्तिष्क की स्थित पर किए गए शोध के सार को देख लेते हैं….

अब इन तीर्थों की यात्रा प्रारंभ होती है ….

ऐसा क्या हैं इन मंदिरों में की यहां कुछ घड़ी रुकते ही अंतःकरण रूपांतरित होने लगता है ? इनकी यात्रा पर निकलने से पहले इन तीन तीर्थों से परिचित हो लेते हैं ..

1- कसार शक्तिपीठ


कसार शक्तिपीठ के संबंध में कुछ मान्य व्यक्तियों के अनुभव ⤵️

लामा अनागारिक गोविन्द 

एक यूरोपीय मूल के बौद्ध साधु थे जिन्होंने कसार देवी क्षेत्र में लंबे समय तक निवास किया। उन्होंने हिमालयी आध्यात्मिक अनुभवों पर कई पुस्तकें भी लिखीं। उनका मानना था कि यह स्थान ध्यान के लिए अत्यंत अनुकूल “ऊर्जा-क्षेत्र” है। 

 वाल्टर इवांस-वेंट्ज़

प्रसिद्ध पुस्तक The Tibetan Book of the Dead के लेखक हैं। उन्होंने कसार देवी क्षेत्र में रहकर हिमालयी आध्यात्मिक परंपराओं का अध्ययन किया। इस क्षेत्र को उन्होंने रहस्यमय और साधना के लिए विशेष माना। 

सिस्टर निवेदिता

उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांतों में अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों (जहाँ कसार देवी भी आती है) के आध्यात्मिक वातावरण का उल्लेख किया है। उनके लेखन में हिमालय को “आत्मिक जागरण का क्षेत्र” बताया गया है। 

 टिमोथी लीरी (हार्वर्ड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक)

उन्होंने कसार देवी को “neuroelectric energy vortex” कहा। उनका विचार है कि यहां “बिना किसी दवा के ब्रह्मांड से जुड़ने जैसा अनुभव” होता है।उन्होंने माना कि यहाँ की प्राकृतिक विद्युत-चुंबकीय स्थिति मानव चेतना को प्रभावित कर सकती है।

डी.एच. लॉरेंस

प्रसिद्ध साहित्यकार, जिन्होंने इस क्षेत्र में समय बिताया

हिमालय की इस शांति और ऊर्जा को रचनात्मक प्रेरणा का स्रोत माना ।

कुछ योगियों ने यहाँ ध्यान के दौरान गहरी मानसिक शांति और मस्तिष्क तरंगों (gamma, theta) में बदलाव का अनुभव बताया 

कसार देवी परिसर के बारे में लिखने/अनुभव करने वाले लोग तीन प्रकार के हैं…

संत और योगी → इसे ध्यान और आत्मबोध का स्थल मानते हैं

दार्शनिक और कलाकार → इसे चेतना और रचनात्मकता को बढ़ाने वाला स्थान बताते हैं

वैज्ञानिक दृष्टिकोण → यहाँ कुछ असामान्य भू-चुंबकीय गुण होने की संभावना मानते हैं, पर पूर्ण प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

👉 यही कारण है कि कसार देवी को…

आध्यात्म + विज्ञान + रहस्य” ,बतीनों का संगम कहा जाता है।

2.जागेश्वर शिव क्षेत्र दर्शन

अल्मोड़ा से 35 km पर स्थित 1870 m ऊंचाई पर स्थित है।

यह शिव ऊर्जा परिसर अल्मोड़ा - पिथौरागढ़ मार्ग पर है।

परिसर में प्रवेश करते ही घंटियों की ध्वनि, देवदार की खुशबू के साथ मनमोहक ठंडी हवा का स्पर्श मिलता है जो तन में आध्यात्मिक रोमांच पैदा करता है। पत्थर के शिखर शैली (Nagara style) में बने छोटे - बड़े समान आकार के मंदिर एक दूसरे से सटे हुए बनाए गए हैं जिनकी संख्या लगभग 124 है। परिसर का वातावरण इतना शांत है कि लोग इसे “प्राकृतिक ध्यान स्थल” भी मानते हैं। चारों तरह से देवदार के घने जंगल से घिरा हुआ,बीच में बहती जटा गंगा की धारा के कारण यह परिसर किसी प्राचीन सिद्ध ऋषि के आश्रम की स्मृति में ले जाता है । यह तीर्थ “भक्ति + आध्यात्मिक ऊर्जा” का केंद्र है।

3.पताल भुवनेश्वर दर्शन

मार्ग : 01

 अल्मोड़ा → बागेश्वर → गंगोलीहाट → पताल भुवनेश्वर 

दूरी ~120 km

मार्ग :02

पिथौरागढ़ → थल → गंगोलीहाट → पाताल भुवनेश्वर :

 दूरी ~ 90-100 km , गंगोलीहाट से लगभग 15 km


पाताल भुवनेश्वर एक रहस्यमय, प्राकृतिक गुफा मंदिर है

जहाँ भूगोल, आध्यात्मिकता और पौराणिक मान्यताएँ एक साथ मिलती हैं। यह कोई सामान्य मंदिर नहीं, बल्कि

चूना पत्थर (limestone) की गुफा है,गुफा के अंदर प्राकृतिक शिवलिंग ,विभिन्न देवी-देवताओं जैसी आकृतियाँ

स्टैलेग्माइट-स्टैलेकटाइट संरचनाएँ हैं।

पूरी गुफा लगभग 90–100 फीट गहराई तक जाती है अतः

बुजुर्ग या कमज़ोर घुटनों वाले लोगों को सावधानी रखनी चाहिए।अंदर जाने के लिए लोहे की चेन पकड़कर उतरते हैं

गुफा का प्रवेश संकरा एवं ढलानदार है और अंदर नमी और फिसलन रहती है। लगभग 80–100 सीढ़ियाँ नीचे गुफा में उतरना पड़ता है। इसे “पाताल लोक का प्रवेश द्वार” माना जाता है। यहां की ऊर्जा आंतरिक कंपन और रोमांच पैदा करती है ।

                    (ऐसे सात छोटे कुंड हैं)

पाताल भुवनेश्वर गुफा की प्राकृतिक आकृतियाँ चूना पत्थर (limestone) पर पानी के रिसाव, खनिज जमा होने और लाखों वर्षों की प्रक्रिया से बनी हैं। ये stalactite (छत से नीचे लटकती) और stalagmite (जमीन से ऊपर उठती) आकृतियाँ हैं, जिन्हें स्थानीय गाइड और भक्त विभिन्न देवी-देवताओं, पौराणिक प्रतीकों और घटनाओं से जोड़ते हैं।

मुख्य प्राकृतिक आकृतियों का वर्णन:

शेषनाग

गुफा के प्रवेश द्वार पर और फर्श पर शेषनाग की विशाल आकृति दिखती है। उसके फन, लंबे नुकीले दांत और कंकाल जैसी संरचना स्पष्ट दिखाई देती है। मान्यता है कि गुफा शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और वह पृथ्वी, स्वर्ग तथा पाताल को संभाले हुए है।

भगवान शिव की जटाएँ

छत से लटकती विशाल stalactites शिव की जटाओं जैसी लगती हैं। इनसे लगातार पानी की बूँदें टपकती रहती हैं, जिसे गंगा का रूप माना जाता है। ये जटाएँ पूरे गुफा में बिखरी हुई हैं।

शिवलिंग 

गुफा के अंदर एक छोटा प्राकृतिक शिवलिंग है, जो धीरे-धीरे बढ़ रहा है। मान्यता है कि जब यह शिवलिंग गुफा की छत को छू लेगा, तब कलयुग का अंत हो जाएगा। अमरनाथ गुफा जैसी आकृति भी दिखती है।

त्रिमूर्ति 

तीन stalagmite आकृतियाँ तीन सिरों जैसी लगती हैं — ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति। इनके ठीक ऊपर छत से तीन stalactites लटकती हैं।

गणेश जी 

गुफा में आदि गणेश या गणेश की मूर्ति जैसी आकृति है। एक जगह सिर रहित बालक का शरीर भी दिखता है, जिसे गणेश जी का रूप माना जाता है।

अन्य आकृतियां

#;ऐरावत हाथी 

दीवारों और फर्श पर हाथी के सिर, कान, सूंड और दांतों जैसी आकृतियाँ हैं। कुछ जगह इसे इंद्र के ऐरावत हाथी के 100 पैरों से जोड़ा जाता है।

# सप्तऋषि मंडल ,अष्टकमल ,ब्रह्मा जी का हंस ,कुबेर, यम, वरुण, लक्ष्मी, गरुड़ आदि की आकृतियाँ।

# द्वार : रामद्वार, पापद्वार, धर्मद्वार, मोक्षद्वार जैसे प्रतीकात्मक द्वार।

# वासुकि नाग, काल भैरव की जीभ जैसी आकृतियाँ।

ये सभी आकृतियाँ पूरी तरह प्राकृतिक हैं। 

~~ ॐ ~~

Monday, March 2, 2026

कुछ ऐसे तीर्थ हैं जहां के जल से गाय के गोबर जैसी गंध आती है

क्या आप जानते हैं ? तीन पवित्र तीर्थ स्थानों के जल से गौ - गोबर की गंध आती है !

ये तीन परम पवित्र प्राचीन तीर्थ निम्न हैं ⤵️

  1. उत्तरप्रदेश प्रयागराजमें स्थित महर्षि भारद्वाज आश्रम

  2. कभी - कभी हर की पौड़ी , हरिद्वार

  3. टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड में स्थित बूढ़ा केदार


1.महर्षि भारद्वाज आश्रम , प्रयागराज

बालसन चौराहे पर महर्षि भारद्वाज की विशाल प्रतिमा (लगभग 51 फीट ऊँची) स्थापित है, जो अब पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण है। इस चौराहे से 400m पर यह आश्रम आश्रम हैं।यह आश्रम मुट्ठी गंज एवं संगम से लगभग 6 km पर स्थित है।

आश्रम परिसर में भारद्वाज कूप के पानी से गोबर जैसी गंध आती हैं इस गंध को धार्मिक परंपरा में पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस जल का सेवन करने से पापों का नाश होता है। आश्चर्य की बात है कि प्रयागराज में कितने वैज्ञानिक संस्थान हैं पर किसी संस्थान द्वारा इस गंध के संबंध में कोई शोध नहीं किया है।

 प्रभु श्री राम , मां सीता और श्री लक्ष्मण जी वनवास की शुरुआत में और वापसी में भी इस आश्रम में विश्राम किए थे। महर्षि भारद्वाज , प्रभु श्री को यहां से चित्रकूट जाने के लिए मार्ग दिखाए थे ।

महर्षि भारद्वाज को प्रयागराज का प्रथम निवासी माना जाता है। वे वेदों, पुराणों, आयुर्वेद (चरक संहिता में उल्लेख), धनुर्वेद और वैमानिक शास्त्र (विमान विज्ञान) के महान ज्ञाता थे। कुछ मान्यताओं के अनुसार उन्होंने विमान उड़ाने की तकनीक और पुष्पक विमान जैसी संरचनाओं का ज्ञान दिया था। प्राचीन काल मेंमहर्षि भारद्वाज का आश्रम बड़ा गुरुकुल (शिक्षा केंद्र) हुआ करता था। आश्रम परिसर में 10-12 मंदिर हैं। आश्रम के पास भारद्वाज पार्क है । यह पूरा मोहल्ला अब भारद्वाज आश्रम नाम से जाना जाता है और यह क्षेत्र ब्राह्मण लोगों का क्षेत्र है।

महर्षि भारद्वाज ऋग्वेद के छठे मंडल (मंडल 6) के मुख्य द्रष्टा (मंत्रों के रचयिता) थे, जिसमें सैकड़ों मंत्र उनके और उनके वंशजों द्वारा रचे गए हैं।चरक संहिता के अनुसार उन्होंने इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। महर्षि भारद्वाज ब्रह्म पुत्र महर्षि अंगिरा के पुत्र देवताओं के गुरु महर्षि बृहस्पति के पुत्र थे और द्रोणाचार्य , महर्षि भारद्वाज के पुत्र थे। उद्धव जी बृहस्पति के शिष्य थे।

2. हर की पौड़ी हरिद्वार 

 कभी - कभी यहां के गंगा जल से भी गौ - गोबर जैसी गंध को महसूस किया जाता है।

हरिद्वार के अनेक पौराणिक नामों में से मायापुरी और गंगा द्वार ऐसे नाम हैं जिन्हें पहले समझ लेते हैं और आगे चल।कर शेष नामों की भी चर्चा होगी। मायापुरी अर्थात बहन लोक से चल कर गंगा जब देवप्रयाग से हरि द्वार में अपना कदम रखती हैं तब उनका पदार्पण त्रिगुणी माया प्रभावित भूखंड में होता है और हरिद्वार से गंगा सागर के मध्य का गंगा क्षेत्र माया में डूबे लोगों के उद्धार के लिए है। हरिद्वार से ऊपर गंगा मायामुक्त योगियों के लिए है जहां सतगुणीयोगी अपनी - अपनी सघन तपस्या में लीन रहते हैं। 

हरिद्वार से पञ्च प्रयाग , पञ्च केदार , पञ्च बद्री , यमुनोत्री , स्वर्गारोहिणी जैसी तीर्थ यात्राएं प्रारंभ होती हैं। आज हम हरिद्वार के ऊर्जा क्षेत्र में अपने कोखोजते हैं ।


कुछ लोग हरिद्वार कहते हैं और कुछ लोग हर द्वार अतः पहले इन दी को समझ लेते हैं क्योंकि संदेह के साथ तीर्थ यात्रा , तीर्थ यात्रा नहीं होती , तीर्थयात्रा तो श्रद्धा और पूर्ण विश्वास पर आधारित होती है। 

यहां से यदि आप बद्रीनाथ की यात्रा प्रारंभ कर रहे हैं तो यह तीर्थ स्थान आपके लिए हरिद्वार होगा और यदि आप यहां से पांच केदार की यात्रा कर रहे हैं तो यह तीर्थ आप के लिए हरद्वार होगा। ऐसा समझिए कि जब आप दिल्ली से चल कर हरिद्वार / हरद्वार क्षेत्र में कदम रखते हैं तब आपके पीठ पीछे भोग संसार होता है और आगे सामने तीर्थ यात्राओं के दो मार्ग दिखने लगते हैं जिन्हें वैराग्य की यात्रा है । 

हरिद्वार से आगे लगभग 70 कम पर अलकनंदा और भागीरथी का संगम देव प्रयाग पड़ता है जहां से ये दोनों परम पवित्र नदियां मिल कर गंगा बन जाती है।इसके आगे यदि आप भागीरथी की ओर रुख करके यात्रा करते हैं तो वह आपकी पञ्च केदार की यात्रा होगी और यदि आप देवप्रयाग से अलकनंदा के साथ यात्रा कर रहे हैं तो आगे बद्री विशाल  की तीर्थ यात्रा होती है। पांच केदार , भोले नाथ से संबंधित यात्राएं हैं जिन्हें हर भी कहते हैं और बद्रीनाथ विष्णु अवतार नर नारायण की तपस्थली है।  

हरिद्वार के कुछ पौराणिक नाम 

गंगाद्वार

मायापुरी

कपिल स्थान

हरद्वार 

हरिद्वार

स्वर्गद्वार

मोक्षद्वार

# गंगाद्वार,हरद्वार और हरिद्वार शब्दों पर ध्यान दें #

ऐसा कहना उचित ही होगा कि हरद्वार / हरिद्वार, वह द्वार है जहां से शिव भक्ति और हरि भक्ति के मार्ग निकलते हैं। भक्ति चाहे शिव की हो या विष्णु की हो , दोनों से एक ही ऊर्जा उत्पन्न होती है जो वैराग्य माध्यम से कैवल्य में पहुंचती है। व

हरिद्वार दिल्ली से लगभग 203-213 किलोमीटर पर स्थित है जिसकी समुद्रतल से औसतन ऊंचाई लगभग 314 मीटर है।

हरिद्वार में स्थित दर्शनीय स्थान

हरिद्वार और उसके आस-पास के प्रमुख साधना क्षेत्र  ⬇️

(हर की पौड़ी से स्थानों की दूरियां km)

हर की पौड़ी

0 km >>>

मानसादेवी

2 km 

चंडी देवी

4 कम 

मायादेवी

1 km

ऋषिकेश

22 km 

सप्त ऋषि आश्रम

5 km 

दक्ष महादेव 

4 km 

नीलकंड

34 km 

पतंजलि योग पीठ

7 km 

भारतमाता

मंदिर

5 km 

राजाजी नेशनल पार्क

6 km 

भीम गौड़ा 

कुंड

2 km 

केशव आश्रम

5 km 

शांतिकुंज

6 km

कनखल

5 km 

प्राचीन सिद्ध पीठ

>हरिद्वार से मां कुंजापुरी > 50 km >हरिद्वार से सरकंडा देवी> 100 km 

दोनों तीर्थ यात्राओं का विस्तार आगे दिया जायेगा।


3. बूढ़ा केदार

हरिद्वार से बूढ़ा केदार की तीर्थ यात्रा

हरिद्वार ( 295–314 मीटर ) > 25 km ऋषिकेश (340m - 409 m) >20 km नरेंद्रनगर (1,200m–1, 322m) > 45 km चंबा (1600m) > 65 km घनसाली (976m) > 25 km बूढ़ा केदार (1340m) कुल दूरी : 180 km 

यह मार्ग Tehri Dam क्षेत्र से होकर गुजरने के कारण बहुत खूबसूरत है, लेकिन पहाड़ी होने से सावधानी के साथ यात्रा करनी चाहिए। घनसाली से बूढ़ा केदार का मार्ग बलगंगा नदी (Bal Ganga River) के समानांतर चलता है । इस यात्रा में जीप लोगे के ओल (Loge ke Ol) एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जहां तक जीप जाती है । घनसाली से यहां तक कि दूरी 25 km  है । धर्म गंगा (Dharm Ganga)और बल गंगा +Bal Ganga)  संगम के समीप 1600 - 1800 m ऊंचाई पर

 बूढ़ा केदार मंदिर परिसर स्थित है। लोगे के ओल

(Loge ke Ol) से मंदिर परिसर तक 2 km की पैदल यात्रा के बाद 350 m की चढ़ाई है । घनसाली बस स्टैंड या मुख्य चौक से बूढ़ा केदार यात्रा के लिए साझा जीप भी उपलब्ध हैं। बूढ़ा केदार यात्रा का समय अक्टूबर-जून का है और मौसम साफ रहने की अधिक संभावना होनी चाहिए। सुबह 6-7 बजे तक घनसाली से निकलें ताकि दोपहर तक वापसी हो सके। स्थानीय जीप ड्राइवरों से संपर्क के लिए **घनसाली ट्रांसपोर्ट यूनियन से संपर्क कर सकते हैं।

जैसा पहले बताया जा चुका है, बूढ़ा केदार मंदिर परिसर धर्म गंगा और बल गंगा संगम के साथ में स्थित है। परिसर ने स्थित कूप के जल से गाय के गोबर जैसी गंध आती है। इस कूप के जल का स्थानीय लोग कई बीमारियों में प्रयोग भी करते हैं। इस क्षेत्र के लोग केदारनाथ धाम की तीर्थ यात्रा नहीं करते , बूढ़ा केदार को ही परम तीर्थ मानते हैं। यहां के पुजारियों में से हां किसी की  मृत्यु को जाती है तब उनके पार्थिव शरीर की अंतिम क्रिया मंदिर परिसर में ही की जाती है। 

जैसे पसीने की बूंदे मानव शरीर से टपकती हैं ठीक इसी तरह शिव लिंग से भी बूंदे टपकती रहती हैं। बूढ़ा केदार का शिवलिंग उत्तर भारत का सबसे बड़ा शिवलिंग है । मंदिर पारंपरिक गढ़वाली शैली में नक्काशीदार पत्थरों से बना प्राचीन 8 वीं शताब्दी का मंदिर है। मंदिर परिसर से देवदार के जंगल और हिमालय की चोटियाँ का दर्शन भी मिलता है।

शिवलिंग पर स्वतः जलबिंदु गिरते रहते हैं, जो उसमें समा जाते हैं। इस कारण इसमें जलाधारी (जल निकासी) नहीं है, जिससे भक्त चारों ओर परिक्रमा कर सकते हैं ।शिवलिंग पर पांडवों, द्रौपदी, नंदी और शिव-पार्वती की नक्काशीदार आकृतियाँ उकेरी गई हैं ।इस स्थान को पंचम केदार या उत्तराखंड का पाँचवाँ धाम कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ शिव ने पांडवों को वृद्ध रूप में दर्शन दिए थे । बूढ़ा केदार में साधारण गेस्ट हाउस उपलब्ध । बूढ़ा केदार शिवलिंग और केदारनाथ धाम के शिवलिंग की तुलनात्मक स्थिति को यहां देख सकते हैं ⤵️

केदारनाथ धाम से 72 km की अति कठिन पैदल बूढ़ा केदार की यात्रा भी की जाती है , जिसका ट्रेकिंग मार्ग निम्न प्रकार है ⤵️


यहां ध्यान रखना होगा कि यह केदारनाथ धाम से बूढ़ा केदार की ट्रेकिंग मार्ग अत्यंत कठिन ट्रैक है और मार्ग में कोई सुविधा भी उपलब्ध नहीं अतः ग्रुप में तथा पूरी तैयारी के साथ ही ट्रेकिंग करनी चाहिए।

बूढ़ा केदार , भगवान शिव के वृद्ध रूप की पूजा के लिए प्रसिद्ध है।यह पाँच केदारों से पहले का एक प्राचीन स्थल माना जाता है।

भागीरथी , टिहरी बांध , भिलंगना , बल गंगा + बाल गंगा , धर्म गंगा , घनसाली और बूढ़ा केदार मंदिर की पारस्परिक स्थितियों के लिए निम्न लाइन डायग्राम को देख सकते हैं ⤵️

उत्तर भारत का सबसे बड़ा शिवलिंग है । यह  पारंपरिक गढ़वाली शैली में नक्काशीदार पत्थरों से बना प्राचीन 8 वीं शताब्दी का मंदिर है। देवदार के जंगल और हिमालय की चोटियाँ का दृश्य भी देखने को मिलते हैं।शिवलिंग पर स्वतः जलबिंदु गिरते रहते हैं, जो उसमें समा जाते हैं , इस कारण इसमें जलाधारी (जल निकासी) नहीं है, जिससे भक्त चारों ओर परिक्रमा कर सकते हैं । शिवलिंग पर पांडवों, द्रौपदी, नंदी और शिव-पार्वती की नक्काशीदार आकृतियाँ उकेरी गई हैं । इस स्थान को पंचम केदार या उत्तराखंड का पाँचवाँ धाम कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ शिव ने पांडवों को वृद्ध रूप में दर्शन दिए थे । बूढ़ा केदार में साधारण गेस्ट हाउस उपलब्ध

 भारद्वाज आश्रम , प्रयागराज , बूढ़ा केदार आश्रमों के मध्य स्थित जल कूपों से गाय के गोबर जैसी गंध का आना हाइड्रोजन सल्फाइड गैस की उपस्थिति हो सकती है।

।।।।। हर हर महादेव।।।।।।।