तप क्या है ?
पहले तप के लिए पतंजलि योगसूत्र के आगे दिए गए 10 सूत्रों की यात्रा करते हैं और इस यात्रा के ही संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के भी 06 श्लोकों की यात्रा होगी जिनका सीधे संबंध तीन प्रकार के तप से है।
(क) पतंजलि योगसूत्र दर्शन में तप
ऊपर व्यक्त पतंजलियोगसूत्र के निम्न 09 सूत्रों के आधार पर तप की यात्रा हो रही है …
<> समाधिपाद सूत्र > 01 + 02 + 3 + 04
<> साधनपाद सूत्र > 01 + 03 +30 +32 + 43
<> कैवल्यपाद सूत्र > 34
<> श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक : 17.14 - 17.19
इन तप संबंधित सूत्रों में पहले तप की परिभाषा देखते हैं जो निम्न प्रकार है …
पतंजलि साधन पाद सूत्र : 43
“काया इंद्रिय सिद्धि: अशुद्धि: क्षयात् तपसः “
“ काया , इंद्रिय सिद्धि एवं अशुद्धि का क्षय, तप है।”
तप से शरीर और इंद्रियों की सिद्धि मिलती है तथा अशुद्धि का क्षय होता है ।अशुद्धि क्या है ?
मूल स्वभाव में परिवर्तन आना , अशुद्धि है। तप संदर्भ में अशुद्धि को दो स्तरों में देखते हैं। पहला स्तर बाह्य अशुद्धि का है और दूसरा स्तर आंतरिक अशुद्धि का है। बाह्य अशुद्धि का संबंध काया से है और आंतरिक अशुद्धि का संबंध अंतःकरण (बुद्धि, अहंकार और मन ) से है।
बाह्य - अशुद्धि क्षय से शरीर निर्मल एवं स्वस्थ्य रहता है और आंतरिक अशुद्धियों के क्षय से अंतःकरण की निर्मलता मिलती है। अंतःकरण निर्मलता में अंतःकरण राजस एवं तामस गुणों की वृत्तियों से मुक्त होता है और चित्त में केवल सात्त्विक गुण की वृत्तियों का आवागमन बना रहता है। इन सात्त्विक गुण की वृत्तियों से भी जब मुक्ति मिल जाती है तप तप सिद्धि मिलती है। तप सिद्धि प्राप्त तपस्वी को सत्य ऐसे स्पष्ट दिखने लगता है जैसे हथेली पर रखा आंवला दिखता है।
ऊपर व्यक्त साधनपाद सूत्र : 43 में तप की परिभाषा ठीक उसी तरह है जैसी योग को समाधिपाद सूत्र : 2 में परिभाषित किया गया है और जो निम्न प्रकार है..
“ योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:”
“ चित्त की वृत्तियों का निरोध ,योग है।”
पतंजलि योगसूत्र में योग और तप कोई विशेष क्रिया नहीं, बल्कि एक अनुशासन हैं , जिसके निरंतर पालन करते रहने से सत्य का बोध होता है। सत्य बोध क्या है ?
जो जैसा है , उसे ठीक उसी तरह देखना , सत्य बोध है। सांख्य दर्शन और पतंजलियोग सूत्र दर्शन में मैं कौन हूं ? प्रश्न का सम्यक बोध , सत्य बोध है । प्रकृति और पुरुष संयोग के फल स्वरूप हम हैं और प्रकृति - पुरुष का बोध ही सत्य बोध है । इस संदर्भ में पतंजलि योगसूत्र समाधिपाद के प्रारंभिक सूत्र 1,3 और 4 को भी समझना होगा जो निम्न प्रकार हैं ..
समाधिपाद सूत्र :01
“अथ योग अनुशासन्
पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 03 👇
तदा + द्रष्टु : स्वरुप : अवस्थानम्
पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 04
वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र
ऊपर के 3 सूत्रों के सार को देखते हैं …
अब योग अनुशासन प्रारंभ होता है । प्रकृति - पुरुष संयोग होते ही पुरुष चित्त स्वरूपाकार हो जाता है और निरंतर योगाभ्यास से जब योग सिद्ध होता है तब पुरुष अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है । इस सत्य को और स्पष्ट समझने केलिए कैवल्यपाद सूत्र - 34 को देखना चाहिए। यह सूत्र कहता है , पुरुषार्थ का शून्य होना एवं गुणों का प्रतिप्रसव होना , कैवल्य है या चित्ति शक्ति ( पुरुष ) का अपनें मूल स्वरूप में स्थित होना, कैवल्य है ।
ऊपर समाधिपाद सूत्र - 1 में महर्षि पतंजलि योग को एक अनुशासन के रूप में देख रहे हैं और जैसे योग एक अनुशासन है वैसे तप भी एक अनुशासन है , जैसा पहले भी बताया जा चुका है।
अनुशासन क्या है ? अनुशासन , अनु + शासन दो शब्दों से बना है । अनु का अर्थ है पहले से और शासन का अर्थ है एक विशेष सुनिश्चित सिद्धांत या नियम। अब एक बार पुनः साधनपाद सूत्र: 43 में दी गई तप की परिभाषा को निम्न स्वरूप में देखते हैं …
“तप वह परंपरा से चला आ रहा सिद्धांत / नियम है जिसके अभ्यास से काया की शुद्धि एवं सिद्धि मिलती है , इंद्रियों का नियोजन होने से उनकी सिद्धि मिलती है और अशुद्धि का क्षय होता है अर्थात चित्त ( अंतःकरण > बुद्धि + अहंकार + मन ) निर्विकार होता है ।” अब पतंजलियोग दर्शन के तप संबंधित शेष सूत्रों की यात्रा करते हैं …
साधनपाद सूत्र - 32
शौच संतोष तपः स्वाध्याय ।
ईश्वर प्रणिधानानि नियमाः ।।
शौच ,संतोष,तप,स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, नियम के 05 अंग हैं।
जैसे यहां अष्टांग योगके दूसरे अंग नियम के 5 अंगोंको बताया जा रहा है वैसे ही साधनपाद सूत्र:30 में अष्टांगयोग के पहले अंग यम के भीं 5 अंगों को भी निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया है …
“अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रहा,यमाः “
अष्टांगयोग साधना में प्रारंभिक दो अंगों - यम और नियम में यम के अंगों का अभ्यास करना होता है और नियम के अंगों का पालन करना होता है।
तप , नियम के पांच अंगों में से एक अंग हैं अतः इसका अभ्यास नहीं करना होता , इसका पालन करना होता है और इस कारण योग और तप अनुशासन हैं।
अब तप संबंधित साधनपाद सूत्र :01 को भी देखते हैं जो निम्न प्रकार है …
साधनपाद सूत्र - 1
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः
“तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, क्रियायोग है।”
अर्थात नियम के 05 अंगों में से आखिरी 03 अंग,के समूह की साधना को क्रियायोग कहते हैं।
पतंजलि योगसूत्र के प्रमुख भाष्यकारों में व्यास, शंकर, भोज और विज्ञानभिक्षु मिलकर तप के संबंध में एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं - तप वह स्वेच्छा से पालन किया गया अनुशासन है जो क्लेशों के संस्कारों के प्रतिकूल शरीर, इन्द्रिय और मन को निर्मल बनाए रखता है। संक्षेप में कह सकते है …
तप एक अनुशासन है जिसकी सिद्धि से पञ्च क्लेश निर्मूल होते हैं । अब देखना होगा कि पञ्च क्लेश क्या हैं ?
साधन पाद सूत्र : 3
अविद्या + अस्मिता + राग + द्वेष + अभिनिवेष , पांच क्लेश हैं। क्लेश कर्माशय की मूल हैं । चित्त को कर्माशय कहते हैं और जबतक क्लेश हैं,आवागमन चक्र में रहना पड़ता है।
इस प्रकार यह कह सकते हैं कि तप सिद्धि से कैवल्य मिलता है जिसे मोक्ष भी कहते हैं।
<> तप के 03 स्तर<>
व्यास भाष्य के संकेतों से तप के निम्न तीन स्तर हैं…
(1) काया तप (शरीर का अनुशासन)
आसन में स्थिरता एवं आहार-विहार में संयम बनाना , इस तप के अंग हैं।
(2) इन्द्रिय तप
इंद्रिय - विषय संयोग के प्रति होश उत्पन्न करना तथा यह समझना कि हर इंद्रिय विषय में राग - द्वेष की ऊर्जा होती है।
(3) मानसिक तप
बुद्धि , अहंकार और मन के कार्य प्रणाली को समझना और चित्त को राजस - तामस गुणों की वृत्तियों से मुक्त करना, इस तप के अंग हैं।
(ख)श्रीमद्भगवद्गीता आधारित तप
संदर्भ > श्लोक : 17.14 - 17.19
(1) काया तप (17.14)
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।
देवता,ब्राह्मण,गुरु और ज्ञानी का पूजन, पवित्रता , सरलता , ब्रह्मचर्य का पालन और अहिंसा का पालन , शारीरिक तप कहलाता है।
(2) वाणी तप (17.15)
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्
उद्वेग मुक्त रहना , प्रिय , हितकारक एवं यथार्थ भाषण तथा वेद - शास्त्र पठन करना तथा ईश्वर का जाप करना , वाणी तप है।
(3) मानसिक तप (17.16)
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः
प्रसन्नता , शांतभाव में रहना , मौन में स्थिर रहना , आत्म विनिग्रह , भावों की शुद्धता का होना , मन तप है।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक : 17- 19 का सार
#ऊपर व्यक्त तीन प्रकार के तप गुणों के आधार पर तीन प्रकार के हैं ….
सात्त्विक तप: श्रद्धायुक्त,कामना मुक्त तप , सात्त्विक तप है।
राजस तप: अहंकार से प्रभावित , पाखंड के प्रभावित , कामना युक्त तप , राजस तप है।
तामस तप: मूढ़ता केंद्रित , दूसरों के अनहित के लिए किया जाना वाला तप तथा जिस तप में शरीर , मन और वाणी के उपयोग में पीड़ा हो रही हो,उस तप को तामस तप कहते हैं।
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