Friday, April 3, 2026

पतंजलि योग सूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता में तप क्या है?


तप क्या है ?

पहले तप के लिए पतंजलि योगसूत्र के आगे दिए गए 10 सूत्रों की यात्रा करते हैं और इस यात्रा के ही संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के भी 06 श्लोकों की यात्रा होगी जिनका सीधे संबंध तीन प्रकार के तप से है।

(क) पतंजलि योगसूत्र दर्शन में तप  

ऊपर व्यक्त पतंजलियोगसूत्र के निम्न 09 सूत्रों के आधार पर तप की यात्रा हो रही है …

<> समाधिपाद सूत्र > 01 + 02 + 3 + 04

<> साधनपाद सूत्र > 01 + 03 +30 +32 + 43

<> कैवल्यपाद सूत्र > 34

<> श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक : 17.14 - 17.19 

इन तप संबंधित सूत्रों में पहले तप की परिभाषा देखते हैं जो निम्न प्रकार है …

पतंजलि साधन पाद सूत्र : 43 

“काया इंद्रिय सिद्धि: अशुद्धि: क्षयात्  तपसः “

“ काया , इंद्रिय सिद्धि एवं अशुद्धि का क्षय, तप है।” 

तप से शरीर और इंद्रियों की सिद्धि मिलती है तथा अशुद्धि का क्षय होता है अशुद्धि क्या है ? 

मूल स्वभाव में परिवर्तन आना , अशुद्धि है। तप संदर्भ में अशुद्धि को दो स्तरों में देखते हैं। पहला स्तर बाह्य अशुद्धि का है और दूसरा स्तर आंतरिक अशुद्धि का है। बाह्य अशुद्धि का संबंध काया से है और आंतरिक अशुद्धि का संबंध अंतःकरण (बुद्धि, अहंकार और मन ) से है।

 बाह्य - अशुद्धि क्षय से शरीर निर्मल एवं स्वस्थ्य रहता है और आंतरिक अशुद्धियों के क्षय से अंतःकरण की निर्मलता मिलती है। अंतःकरण निर्मलता में अंतःकरण राजस एवं तामस गुणों की वृत्तियों से मुक्त होता है और चित्त  में केवल सात्त्विक गुण की वृत्तियों का आवागमन बना रहता है। इन सात्त्विक गुण की वृत्तियों से भी जब मुक्ति मिल जाती है तप तप सिद्धि मिलती है। तप सिद्धि प्राप्त तपस्वी को सत्य ऐसे स्पष्ट दिखने लगता है जैसे हथेली पर रखा आंवला दिखता है।

ऊपर व्यक्त साधनपाद सूत्र : 43 में तप की परिभाषा ठीक उसी तरह है जैसी योग को समाधिपाद सूत्र : 2 में परिभाषित किया गया है और जो निम्न प्रकार है..

“ योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:”

“ चित्त की वृत्तियों का निरोध ,योग है।”

पतंजलि योगसूत्र में योग और तप कोई विशेष क्रिया नहीं, बल्कि एक अनुशासन हैं , जिसके निरंतर पालन करते रहने से सत्य का बोध होता है। सत्य बोध क्या है ? 

जो जैसा है , उसे ठीक उसी तरह देखना , सत्य बोध है। सांख्य दर्शन और पतंजलियोग सूत्र दर्शन में मैं कौन हूं ? प्रश्न का सम्यक बोध , सत्य बोध है । प्रकृति और पुरुष संयोग के फल स्वरूप हम हैं और प्रकृति - पुरुष का बोध ही सत्य बोध है । इस संदर्भ में पतंजलि योगसूत्र समाधिपाद के प्रारंभिक सूत्र 1,3 और 4 को भी समझना होगा जो निम्न प्रकार हैं ..

समाधिपाद सूत्र :01

“अथ योग अनुशासन्

पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 03 👇 

तदा + द्रष्टु : स्वरुप : अवस्थानम् 

पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 04

वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र

ऊपर के 3 सूत्रों के सार को देखते हैं …

अब योग अनुशासन प्रारंभ होता है । प्रकृति - पुरुष संयोग होते ही पुरुष चित्त स्वरूपाकार हो जाता है और निरंतर योगाभ्यास से जब योग सिद्ध होता है तब पुरुष अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है । इस सत्य को और स्पष्ट समझने केलिए कैवल्यपाद सूत्र - 34 को देखना चाहिए। यह सूत्र कहता है , पुरुषार्थ का शून्य होना एवं गुणों का प्रतिप्रसव होना , कैवल्य है या  चित्ति शक्ति ( पुरुष ) का अपनें मूल स्वरूप में स्थित होना, कैवल्य है । 

ऊपर समाधिपाद सूत्र - 1 में महर्षि पतंजलि योग को एक अनुशासन के रूप में देख रहे हैं और जैसे योग एक अनुशासन है वैसे तप भी एक अनुशासन है , जैसा पहले भी बताया जा चुका है।

अनुशासन क्या है ? अनुशासन , अनु + शासन दो शब्दों से बना है । अनु का अर्थ है पहले से और शासन का अर्थ है एक विशेष सुनिश्चित सिद्धांत या नियम। अब एक बार पुनः  साधनपाद सूत्र: 43 में दी गई तप  की परिभाषा को निम्न स्वरूप में देखते हैं …

“तप वह परंपरा से चला आ  रहा सिद्धांत / नियम है जिसके अभ्यास से काया की शुद्धि एवं सिद्धि मिलती है , इंद्रियों का नियोजन होने से उनकी सिद्धि मिलती है और अशुद्धि का क्षय होता है अर्थात चित्त ( अंतःकरण > बुद्धि + अहंकार + मन )  निर्विकार होता है ।” अब पतंजलियोग दर्शन के तप संबंधित शेष सूत्रों की यात्रा करते हैं …

 साधनपाद सूत्र - 32 

शौच संतोष तपः स्वाध्याय ।

ईश्वर प्रणिधानानि नियमाः ।।

शौच ,संतोष,तप,स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, नियम के 05 अंग हैं। 

जैसे यहां अष्टांग योगके दूसरे अंग नियम के 5 अंगोंको बताया जा रहा है  वैसे ही  साधनपाद सूत्र:30 में अष्टांगयोग के पहले अंग यम के भीं 5 अंगों को भी निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया है …

“अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रहा,यमाः

अष्टांगयोग साधना में प्रारंभिक दो अंगों - यम और नियम में यम के अंगों का अभ्यास करना होता है और नियम के अंगों का पालन करना होता है। 

तप , नियम के पांच अंगों में से एक अंग हैं अतः इसका अभ्यास नहीं करना होता , इसका पालन करना होता है और इस कारण योग और तप अनुशासन हैं। 

अब तप संबंधित साधनपाद सूत्र :01 को भी देखते हैं जो निम्न प्रकार है …

साधनपाद सूत्र - 1 

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः

“तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, क्रियायोग है।”

अर्थात नियम के 05 अंगों में से आखिरी 03 अंग,के समूह की साधना को क्रियायोग कहते हैं।

 पतंजलि योगसूत्र के प्रमुख भाष्यकारों में व्यास, शंकर, भोज और विज्ञानभिक्षु  मिलकर तप के संबंध में एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं - तप वह स्वेच्छा से पालन किया गया अनुशासन है जो क्लेशों के संस्कारों के प्रतिकूल शरीर, इन्द्रिय और मन को निर्मल बनाए रखता है। संक्षेप में कह सकते है …

तप एक अनुशासन है जिसकी सिद्धि से पञ्च क्लेश निर्मूल होते हैं । अब देखना होगा कि पञ्च क्लेश क्या हैं ?

साधन पाद सूत्र : 3

अविद्या + अस्मिता + राग + द्वेष + अभिनिवेष , पांच क्लेश हैं। क्लेश कर्माशय की मूल हैं । चित्त को कर्माशय कहते हैं और जबतक क्लेश हैं,आवागमन चक्र में रहना पड़ता है। 

इस प्रकार यह कह सकते हैं कि तप सिद्धि से कैवल्य मिलता है जिसे मोक्ष भी कहते हैं।

<> तप के 03 स्तर<>

व्यास भाष्य के संकेतों से तप के निम्न तीन स्तर हैं…

(1) काया तप (शरीर का अनुशासन)

आसन में स्थिरता एवं आहार-विहार में संयम बनाना , इस तप के अंग हैं।

(2) इन्द्रिय तप

 इंद्रिय - विषय संयोग के प्रति होश उत्पन्न करना तथा यह समझना कि हर इंद्रिय विषय में राग - द्वेष की ऊर्जा होती है।

(3) मानसिक तप

बुद्धि , अहंकार और मन के कार्य प्रणाली को समझना और चित्त को राजस - तामस गुणों की वृत्तियों से मुक्त करना, इस तप के अंग हैं। 

(ख)श्रीमद्भगवद्गीता आधारित तप

संदर्भ > श्लोक : 17.14 - 17.19 


(1) काया तप (17.14)

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।

देवता,ब्राह्मण,गुरु और ज्ञानी का पूजन, पवित्रता , सरलता , ब्रह्मचर्य का पालन और अहिंसा का पालन , शारीरिक तप कहलाता है।


(2) वाणी तप (17.15)

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्

उद्वेग मुक्त रहना , प्रिय , हितकारक एवं यथार्थ भाषण तथा वेद - शास्त्र पठन करना तथा ईश्वर का जाप करना , वाणी तप है।

(3) मानसिक तप (17.16)

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः

प्रसन्नता , शांतभाव में रहना , मौन में स्थिर रहना , आत्म विनिग्रह , भावों की शुद्धता का होना , मन तप है।

श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक : 17- 19 का सार

#ऊपर व्यक्त तीन प्रकार के तप गुणों के आधार पर तीन प्रकार के हैं ….

सात्त्विक तप: श्रद्धायुक्त,कामना मुक्त तप , सात्त्विक तप है।

राजस तप: अहंकार से प्रभावित , पाखंड के प्रभावित , कामना युक्त तप , राजस तप है।

तामस तप: मूढ़ता केंद्रित , दूसरों के अनहित के लिए किया जाना वाला तप तथा जिस तप में शरीर , मन और वाणी के उपयोग में पीड़ा हो रही हो,उस तप को तामस तप कहते हैं।

~~~ ॐ ~~~

Wednesday, March 25, 2026

उत्तराखंड में स्थित तीन दिव्य ऊर्जा क्षेत्र



उत्तराखंड के तीन पवित्र तीर्थ जहां की ऊर्जा सीधे समाधि में पहुंचाती है👇


तीर्थ

विवरण

कसार देवी

समुद्रतल से 

ऊंचाई 2100 m 

अल्मोड़ा  से लगभग 8 किमी दूर कसार देवी गाँव की कश्यप पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। Swami Vivekananda 1890 में यहाँ ध्यान करने आए थे। 

जागेश्वर

समुद्रतल से ऊंचाई

~ 1870 m

यह अल्मोड़ा से लगभग 35 किमी दूर

घने देवदार जंगलों के बीच स्थित +124 मंदिरों का समूह  मार्ग ⤵️

अल्मोड़ा → आर्टोला → जागेश्वर

पताल भुवनेश्वर

समुद्रतल से ऊंचाई

1350 m 

यह पिथौरागढ़ में गंगोलीहाट से 15 किमी दूर स्थित है गुफा में स्थित है।

मार्ग :01: 100 किमी 

पिथौरागढ़ → थल → गंगोलीहाट → पाताल भुवनेश्वर  

मार्ग : 02 : 120 किमी 

 अल्मोड़ा → बागेश्वर → गंगोलीहाट → पातालभुवनेश्वर 

ऊपर व्यक्त तीन तीर्थ में ध्यान शीघ्रता से घटित होने लगता है और ध्यान की उच्च भूमि मिलते ही समाधि भी घटित हो जाती है। इन पवित्र तीर्थोंकी यात्रा प्रारंभ करने से पहले इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइड में वैज्ञानिकों द्वारा ध्यान में डूबे साधक के मस्तिष्क की स्थित पर किए गए शोध के सार को देख लेते हैं….

अब इन तीर्थों की यात्रा प्रारंभ होती है ….

ऐसा क्या हैं इन मंदिरों में की यहां कुछ घड़ी रुकते ही अंतःकरण रूपांतरित होने लगता है ? इनकी यात्रा पर निकलने से पहले इन तीन तीर्थों से परिचित हो लेते हैं ..

1- कसार शक्तिपीठ


कसार शक्तिपीठ के संबंध में कुछ मान्य व्यक्तियों के अनुभव ⤵️

लामा अनागारिक गोविन्द 

एक यूरोपीय मूल के बौद्ध साधु थे जिन्होंने कसार देवी क्षेत्र में लंबे समय तक निवास किया। उन्होंने हिमालयी आध्यात्मिक अनुभवों पर कई पुस्तकें भी लिखीं। उनका मानना था कि यह स्थान ध्यान के लिए अत्यंत अनुकूल “ऊर्जा-क्षेत्र” है। 

 वाल्टर इवांस-वेंट्ज़

प्रसिद्ध पुस्तक The Tibetan Book of the Dead के लेखक हैं। उन्होंने कसार देवी क्षेत्र में रहकर हिमालयी आध्यात्मिक परंपराओं का अध्ययन किया। इस क्षेत्र को उन्होंने रहस्यमय और साधना के लिए विशेष माना। 

सिस्टर निवेदिता

उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांतों में अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों (जहाँ कसार देवी भी आती है) के आध्यात्मिक वातावरण का उल्लेख किया है। उनके लेखन में हिमालय को “आत्मिक जागरण का क्षेत्र” बताया गया है। 

 टिमोथी लीरी (हार्वर्ड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक)

उन्होंने कसार देवी को “neuroelectric energy vortex” कहा। उनका विचार है कि यहां “बिना किसी दवा के ब्रह्मांड से जुड़ने जैसा अनुभव” होता है।उन्होंने माना कि यहाँ की प्राकृतिक विद्युत-चुंबकीय स्थिति मानव चेतना को प्रभावित कर सकती है।

डी.एच. लॉरेंस

प्रसिद्ध साहित्यकार, जिन्होंने इस क्षेत्र में समय बिताया

हिमालय की इस शांति और ऊर्जा को रचनात्मक प्रेरणा का स्रोत माना ।

कुछ योगियों ने यहाँ ध्यान के दौरान गहरी मानसिक शांति और मस्तिष्क तरंगों (gamma, theta) में बदलाव का अनुभव बताया 

कसार देवी परिसर के बारे में लिखने/अनुभव करने वाले लोग तीन प्रकार के हैं…

संत और योगी → इसे ध्यान और आत्मबोध का स्थल मानते हैं

दार्शनिक और कलाकार → इसे चेतना और रचनात्मकता को बढ़ाने वाला स्थान बताते हैं

वैज्ञानिक दृष्टिकोण → यहाँ कुछ असामान्य भू-चुंबकीय गुण होने की संभावना मानते हैं, पर पूर्ण प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

👉 यही कारण है कि कसार देवी को…

आध्यात्म + विज्ञान + रहस्य” ,बतीनों का संगम कहा जाता है।

2.जागेश्वर शिव क्षेत्र दर्शन

अल्मोड़ा से 35 km पर स्थित 1870 m ऊंचाई पर स्थित है।

यह शिव ऊर्जा परिसर अल्मोड़ा - पिथौरागढ़ मार्ग पर है।

परिसर में प्रवेश करते ही घंटियों की ध्वनि, देवदार की खुशबू के साथ मनमोहक ठंडी हवा का स्पर्श मिलता है जो तन में आध्यात्मिक रोमांच पैदा करता है। पत्थर के शिखर शैली (Nagara style) में बने छोटे - बड़े समान आकार के मंदिर एक दूसरे से सटे हुए बनाए गए हैं जिनकी संख्या लगभग 124 है। परिसर का वातावरण इतना शांत है कि लोग इसे “प्राकृतिक ध्यान स्थल” भी मानते हैं। चारों तरह से देवदार के घने जंगल से घिरा हुआ,बीच में बहती जटा गंगा की धारा के कारण यह परिसर किसी प्राचीन सिद्ध ऋषि के आश्रम की स्मृति में ले जाता है । यह तीर्थ “भक्ति + आध्यात्मिक ऊर्जा” का केंद्र है।

3.पताल भुवनेश्वर दर्शन

मार्ग : 01

 अल्मोड़ा → बागेश्वर → गंगोलीहाट → पताल भुवनेश्वर 

दूरी ~120 km

मार्ग :02

पिथौरागढ़ → थल → गंगोलीहाट → पाताल भुवनेश्वर :

 दूरी ~ 90-100 km , गंगोलीहाट से लगभग 15 km


पाताल भुवनेश्वर एक रहस्यमय, प्राकृतिक गुफा मंदिर है

जहाँ भूगोल, आध्यात्मिकता और पौराणिक मान्यताएँ एक साथ मिलती हैं। यह कोई सामान्य मंदिर नहीं, बल्कि

चूना पत्थर (limestone) की गुफा है,गुफा के अंदर प्राकृतिक शिवलिंग ,विभिन्न देवी-देवताओं जैसी आकृतियाँ

स्टैलेग्माइट-स्टैलेकटाइट संरचनाएँ हैं।

पूरी गुफा लगभग 90–100 फीट गहराई तक जाती है अतः

बुजुर्ग या कमज़ोर घुटनों वाले लोगों को सावधानी रखनी चाहिए।अंदर जाने के लिए लोहे की चेन पकड़कर उतरते हैं

गुफा का प्रवेश संकरा एवं ढलानदार है और अंदर नमी और फिसलन रहती है। लगभग 80–100 सीढ़ियाँ नीचे गुफा में उतरना पड़ता है। इसे “पाताल लोक का प्रवेश द्वार” माना जाता है। यहां की ऊर्जा आंतरिक कंपन और रोमांच पैदा करती है ।

                    (ऐसे सात छोटे कुंड हैं)

पाताल भुवनेश्वर गुफा की प्राकृतिक आकृतियाँ चूना पत्थर (limestone) पर पानी के रिसाव, खनिज जमा होने और लाखों वर्षों की प्रक्रिया से बनी हैं। ये stalactite (छत से नीचे लटकती) और stalagmite (जमीन से ऊपर उठती) आकृतियाँ हैं, जिन्हें स्थानीय गाइड और भक्त विभिन्न देवी-देवताओं, पौराणिक प्रतीकों और घटनाओं से जोड़ते हैं।

मुख्य प्राकृतिक आकृतियों का वर्णन:

शेषनाग

गुफा के प्रवेश द्वार पर और फर्श पर शेषनाग की विशाल आकृति दिखती है। उसके फन, लंबे नुकीले दांत और कंकाल जैसी संरचना स्पष्ट दिखाई देती है। मान्यता है कि गुफा शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और वह पृथ्वी, स्वर्ग तथा पाताल को संभाले हुए है।

भगवान शिव की जटाएँ

छत से लटकती विशाल stalactites शिव की जटाओं जैसी लगती हैं। इनसे लगातार पानी की बूँदें टपकती रहती हैं, जिसे गंगा का रूप माना जाता है। ये जटाएँ पूरे गुफा में बिखरी हुई हैं।

शिवलिंग 

गुफा के अंदर एक छोटा प्राकृतिक शिवलिंग है, जो धीरे-धीरे बढ़ रहा है। मान्यता है कि जब यह शिवलिंग गुफा की छत को छू लेगा, तब कलयुग का अंत हो जाएगा। अमरनाथ गुफा जैसी आकृति भी दिखती है।

त्रिमूर्ति 

तीन stalagmite आकृतियाँ तीन सिरों जैसी लगती हैं — ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति। इनके ठीक ऊपर छत से तीन stalactites लटकती हैं।

गणेश जी 

गुफा में आदि गणेश या गणेश की मूर्ति जैसी आकृति है। एक जगह सिर रहित बालक का शरीर भी दिखता है, जिसे गणेश जी का रूप माना जाता है।

अन्य आकृतियां

#;ऐरावत हाथी 

दीवारों और फर्श पर हाथी के सिर, कान, सूंड और दांतों जैसी आकृतियाँ हैं। कुछ जगह इसे इंद्र के ऐरावत हाथी के 100 पैरों से जोड़ा जाता है।

# सप्तऋषि मंडल ,अष्टकमल ,ब्रह्मा जी का हंस ,कुबेर, यम, वरुण, लक्ष्मी, गरुड़ आदि की आकृतियाँ।

# द्वार : रामद्वार, पापद्वार, धर्मद्वार, मोक्षद्वार जैसे प्रतीकात्मक द्वार।

# वासुकि नाग, काल भैरव की जीभ जैसी आकृतियाँ।

ये सभी आकृतियाँ पूरी तरह प्राकृतिक हैं। 

~~ ॐ ~~