Monday, March 2, 2026

कुछ ऐसे तीर्थ हैं जहां के जल से गाय के गोबर जैसी गंध आती है

क्या आप जानते हैं ? तीन पवित्र तीर्थ स्थानों के जल से गौ - गोबर की गंध आती है !

ये तीन परम पवित्र प्राचीन तीर्थ निम्न हैं ⤵️

  1. उत्तरप्रदेश प्रयागराजमें स्थित महर्षि भारद्वाज आश्रम

  2. कभी - कभी हर की पौड़ी , हरिद्वार

  3. टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड में स्थित बूढ़ा केदार


1.महर्षि भारद्वाज आश्रम , प्रयागराज

बालसन चौराहे पर महर्षि भारद्वाज की विशाल प्रतिमा (लगभग 51 फीट ऊँची) स्थापित है, जो अब पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण है। इस चौराहे से 400m पर यह आश्रम आश्रम हैं।यह आश्रम मुट्ठी गंज एवं संगम से लगभग 6 km पर स्थित है।

आश्रम परिसर में भारद्वाज कूप के पानी से गोबर जैसी गंध आती हैं इस गंध को धार्मिक परंपरा में पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस जल का सेवन करने से पापों का नाश होता है। आश्चर्य की बात है कि प्रयागराज में कितने वैज्ञानिक संस्थान हैं पर किसी संस्थान द्वारा इस गंध के संबंध में कोई शोध नहीं किया है।

 प्रभु श्री राम , मां सीता और श्री लक्ष्मण जी वनवास की शुरुआत में और वापसी में भी इस आश्रम में विश्राम किए थे। महर्षि भारद्वाज , प्रभु श्री को यहां से चित्रकूट जाने के लिए मार्ग दिखाए थे ।

महर्षि भारद्वाज को प्रयागराज का प्रथम निवासी माना जाता है। वे वेदों, पुराणों, आयुर्वेद (चरक संहिता में उल्लेख), धनुर्वेद और वैमानिक शास्त्र (विमान विज्ञान) के महान ज्ञाता थे। कुछ मान्यताओं के अनुसार उन्होंने विमान उड़ाने की तकनीक और पुष्पक विमान जैसी संरचनाओं का ज्ञान दिया था। प्राचीन काल मेंमहर्षि भारद्वाज का आश्रम बड़ा गुरुकुल (शिक्षा केंद्र) हुआ करता था। आश्रम परिसर में 10-12 मंदिर हैं। आश्रम के पास भारद्वाज पार्क है । यह पूरा मोहल्ला अब भारद्वाज आश्रम नाम से जाना जाता है और यह क्षेत्र ब्राह्मण लोगों का क्षेत्र है।

महर्षि भारद्वाज ऋग्वेद के छठे मंडल (मंडल 6) के मुख्य द्रष्टा (मंत्रों के रचयिता) थे, जिसमें सैकड़ों मंत्र उनके और उनके वंशजों द्वारा रचे गए हैं।चरक संहिता के अनुसार उन्होंने इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। महर्षि भारद्वाज ब्रह्म पुत्र महर्षि अंगिरा के पुत्र देवताओं के गुरु महर्षि बृहस्पति के पुत्र थे और द्रोणाचार्य , महर्षि भारद्वाज के पुत्र थे। उद्धव जी बृहस्पति के शिष्य थे।

2. हर की पौड़ी हरिद्वार 

 कभी - कभी यहां के गंगा जल से भी गौ - गोबर जैसी गंध को महसूस किया जाता है।

हरिद्वार के अनेक पौराणिक नामों में से मायापुरी और गंगा द्वार ऐसे नाम हैं जिन्हें पहले समझ लेते हैं और आगे चल।कर शेष नामों की भी चर्चा होगी। मायापुरी अर्थात बहन लोक से चल कर गंगा जब देवप्रयाग से हरि द्वार में अपना कदम रखती हैं तब उनका पदार्पण त्रिगुणी माया प्रभावित भूखंड में होता है और हरिद्वार से गंगा सागर के मध्य का गंगा क्षेत्र माया में डूबे लोगों के उद्धार के लिए है। हरिद्वार से ऊपर गंगा मायामुक्त योगियों के लिए है जहां सतगुणीयोगी अपनी - अपनी सघन तपस्या में लीन रहते हैं। 

हरिद्वार से पञ्च प्रयाग , पञ्च केदार , पञ्च बद्री , यमुनोत्री , स्वर्गारोहिणी जैसी तीर्थ यात्राएं प्रारंभ होती हैं। आज हम हरिद्वार के ऊर्जा क्षेत्र में अपने कोखोजते हैं ।


कुछ लोग हरिद्वार कहते हैं और कुछ लोग हर द्वार अतः पहले इन दी को समझ लेते हैं क्योंकि संदेह के साथ तीर्थ यात्रा , तीर्थ यात्रा नहीं होती , तीर्थयात्रा तो श्रद्धा और पूर्ण विश्वास पर आधारित होती है। 

यहां से यदि आप बद्रीनाथ की यात्रा प्रारंभ कर रहे हैं तो यह तीर्थ स्थान आपके लिए हरिद्वार होगा और यदि आप यहां से पांच केदार की यात्रा कर रहे हैं तो यह तीर्थ आप के लिए हरद्वार होगा। ऐसा समझिए कि जब आप दिल्ली से चल कर हरिद्वार / हरद्वार क्षेत्र में कदम रखते हैं तब आपके पीठ पीछे भोग संसार होता है और आगे सामने तीर्थ यात्राओं के दो मार्ग दिखने लगते हैं जिन्हें वैराग्य की यात्रा है । 

हरिद्वार से आगे लगभग 70 कम पर अलकनंदा और भागीरथी का संगम देव प्रयाग पड़ता है जहां से ये दोनों परम पवित्र नदियां मिल कर गंगा बन जाती है।इसके आगे यदि आप भागीरथी की ओर रुख करके यात्रा करते हैं तो वह आपकी पञ्च केदार की यात्रा होगी और यदि आप देवप्रयाग से अलकनंदा के साथ यात्रा कर रहे हैं तो आगे बद्री विशाल  की तीर्थ यात्रा होती है। पांच केदार , भोले नाथ से संबंधित यात्राएं हैं जिन्हें हर भी कहते हैं और बद्रीनाथ विष्णु अवतार नर नारायण की तपस्थली है।  

हरिद्वार के कुछ पौराणिक नाम 

गंगाद्वार

मायापुरी

कपिल स्थान

हरद्वार 

हरिद्वार

स्वर्गद्वार

मोक्षद्वार

# गंगाद्वार,हरद्वार और हरिद्वार शब्दों पर ध्यान दें #

ऐसा कहना उचित ही होगा कि हरद्वार / हरिद्वार, वह द्वार है जहां से शिव भक्ति और हरि भक्ति के मार्ग निकलते हैं। भक्ति चाहे शिव की हो या विष्णु की हो , दोनों से एक ही ऊर्जा उत्पन्न होती है जो वैराग्य माध्यम से कैवल्य में पहुंचती है। व

हरिद्वार दिल्ली से लगभग 203-213 किलोमीटर पर स्थित है जिसकी समुद्रतल से औसतन ऊंचाई लगभग 314 मीटर है।

हरिद्वार में स्थित दर्शनीय स्थान

हरिद्वार और उसके आस-पास के प्रमुख साधना क्षेत्र  ⬇️

(हर की पौड़ी से स्थानों की दूरियां km)

हर की पौड़ी

0 km >>>

मानसादेवी

2 km 

चंडी देवी

4 कम 

मायादेवी

1 km

ऋषिकेश

22 km 

सप्त ऋषि आश्रम

5 km 

दक्ष महादेव 

4 km 

नीलकंड

34 km 

पतंजलि योग पीठ

7 km 

भारतमाता

मंदिर

5 km 

राजाजी नेशनल पार्क

6 km 

भीम गौड़ा 

कुंड

2 km 

केशव आश्रम

5 km 

शांतिकुंज

6 km

कनखल

5 km 

प्राचीन सिद्ध पीठ

>हरिद्वार से मां कुंजापुरी > 50 km >हरिद्वार से सरकंडा देवी> 100 km 

दोनों तीर्थ यात्राओं का विस्तार आगे दिया जायेगा।


3. बूढ़ा केदार

हरिद्वार से बूढ़ा केदार की तीर्थ यात्रा

हरिद्वार ( 295–314 मीटर ) > 25 km ऋषिकेश (340m - 409 m) >20 km नरेंद्रनगर (1,200m–1, 322m) > 45 km चंबा (1600m) > 65 km घनसाली (976m) > 25 km बूढ़ा केदार (1340m) कुल दूरी : 180 km 

यह मार्ग Tehri Dam क्षेत्र से होकर गुजरने के कारण बहुत खूबसूरत है, लेकिन पहाड़ी होने से सावधानी के साथ यात्रा करनी चाहिए। घनसाली से बूढ़ा केदार का मार्ग बलगंगा नदी (Bal Ganga River) के समानांतर चलता है । इस यात्रा में जीप लोगे के ओल (Loge ke Ol) एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जहां तक जीप जाती है । घनसाली से यहां तक कि दूरी 25 km  है । धर्म गंगा (Dharm Ganga)और बल गंगा +Bal Ganga)  संगम के समीप 1600 - 1800 m ऊंचाई पर

 बूढ़ा केदार मंदिर परिसर स्थित है। लोगे के ओल

(Loge ke Ol) से मंदिर परिसर तक 2 km की पैदल यात्रा के बाद 350 m की चढ़ाई है । घनसाली बस स्टैंड या मुख्य चौक से बूढ़ा केदार यात्रा के लिए साझा जीप भी उपलब्ध हैं। बूढ़ा केदार यात्रा का समय अक्टूबर-जून का है और मौसम साफ रहने की अधिक संभावना होनी चाहिए। सुबह 6-7 बजे तक घनसाली से निकलें ताकि दोपहर तक वापसी हो सके। स्थानीय जीप ड्राइवरों से संपर्क के लिए **घनसाली ट्रांसपोर्ट यूनियन से संपर्क कर सकते हैं।

जैसा पहले बताया जा चुका है, बूढ़ा केदार मंदिर परिसर धर्म गंगा और बल गंगा संगम के साथ में स्थित है। परिसर ने स्थित कूप के जल से गाय के गोबर जैसी गंध आती है। इस कूप के जल का स्थानीय लोग कई बीमारियों में प्रयोग भी करते हैं। इस क्षेत्र के लोग केदारनाथ धाम की तीर्थ यात्रा नहीं करते , बूढ़ा केदार को ही परम तीर्थ मानते हैं। यहां के पुजारियों में से हां किसी की  मृत्यु को जाती है तब उनके पार्थिव शरीर की अंतिम क्रिया मंदिर परिसर में ही की जाती है। 

जैसे पसीने की बूंदे मानव शरीर से टपकती हैं ठीक इसी तरह शिव लिंग से भी बूंदे टपकती रहती हैं। बूढ़ा केदार का शिवलिंग उत्तर भारत का सबसे बड़ा शिवलिंग है । मंदिर पारंपरिक गढ़वाली शैली में नक्काशीदार पत्थरों से बना प्राचीन 8 वीं शताब्दी का मंदिर है। मंदिर परिसर से देवदार के जंगल और हिमालय की चोटियाँ का दर्शन भी मिलता है।

शिवलिंग पर स्वतः जलबिंदु गिरते रहते हैं, जो उसमें समा जाते हैं। इस कारण इसमें जलाधारी (जल निकासी) नहीं है, जिससे भक्त चारों ओर परिक्रमा कर सकते हैं ।शिवलिंग पर पांडवों, द्रौपदी, नंदी और शिव-पार्वती की नक्काशीदार आकृतियाँ उकेरी गई हैं ।इस स्थान को पंचम केदार या उत्तराखंड का पाँचवाँ धाम कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ शिव ने पांडवों को वृद्ध रूप में दर्शन दिए थे । बूढ़ा केदार में साधारण गेस्ट हाउस उपलब्ध । बूढ़ा केदार शिवलिंग और केदारनाथ धाम के शिवलिंग की तुलनात्मक स्थिति को यहां देख सकते हैं ⤵️

केदारनाथ धाम से 72 km की अति कठिन पैदल बूढ़ा केदार की यात्रा भी की जाती है , जिसका ट्रेकिंग मार्ग निम्न प्रकार है ⤵️


यहां ध्यान रखना होगा कि यह केदारनाथ धाम से बूढ़ा केदार की ट्रेकिंग मार्ग अत्यंत कठिन ट्रैक है और मार्ग में कोई सुविधा भी उपलब्ध नहीं अतः ग्रुप में तथा पूरी तैयारी के साथ ही ट्रेकिंग करनी चाहिए।

बूढ़ा केदार , भगवान शिव के वृद्ध रूप की पूजा के लिए प्रसिद्ध है।यह पाँच केदारों से पहले का एक प्राचीन स्थल माना जाता है।

भागीरथी , टिहरी बांध , भिलंगना , बल गंगा + बाल गंगा , धर्म गंगा , घनसाली और बूढ़ा केदार मंदिर की पारस्परिक स्थितियों के लिए निम्न लाइन डायग्राम को देख सकते हैं ⤵️

उत्तर भारत का सबसे बड़ा शिवलिंग है । यह  पारंपरिक गढ़वाली शैली में नक्काशीदार पत्थरों से बना प्राचीन 8 वीं शताब्दी का मंदिर है। देवदार के जंगल और हिमालय की चोटियाँ का दृश्य भी देखने को मिलते हैं।शिवलिंग पर स्वतः जलबिंदु गिरते रहते हैं, जो उसमें समा जाते हैं , इस कारण इसमें जलाधारी (जल निकासी) नहीं है, जिससे भक्त चारों ओर परिक्रमा कर सकते हैं । शिवलिंग पर पांडवों, द्रौपदी, नंदी और शिव-पार्वती की नक्काशीदार आकृतियाँ उकेरी गई हैं । इस स्थान को पंचम केदार या उत्तराखंड का पाँचवाँ धाम कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ शिव ने पांडवों को वृद्ध रूप में दर्शन दिए थे । बूढ़ा केदार में साधारण गेस्ट हाउस उपलब्ध

 भारद्वाज आश्रम , प्रयागराज , बूढ़ा केदार आश्रमों के मध्य स्थित जल कूपों से गाय के गोबर जैसी गंध का आना हाइड्रोजन सल्फाइड गैस की उपस्थिति हो सकती है।

।।।।। हर हर महादेव।।।।।।।

Wednesday, February 25, 2026

उत्तराखंड चार धाम तीर्थ यात्रा समागम


उत्तराखंड की चार धाम तीर्थ यात्रा

(हरिद्वार से यमुनोत्री , गंगोत्री , गौमुख , तपोवन , केदारताल , केदारनाथ , बद्रीनाथ और बद्रीनाथबसे हरिद्वार तीर्थ यात्रा का स्वरूप)

अब ऊपर वर्णित चार धाम की यात्रा में आने वाले स्थानों की समुद्रतल से ऊंचाइयां मीटर में तथा यात्राओं का संक्षिप्त विवरण ⤵️

1️⃣ 🚗हरिद्वार → उत्तरकाशी 

  1. हरिद्वार →        ऋषिकेश > 25 km

ऊँचाई: हरिद्वार (314 m) → ऋषिकेश (372 m)

 यात्रा गंगा नदी के किनारे-किनारे चलती है।

      2. ऋषिकेश → नरेंद्र नगर → चंबा > 65 

ऊँचाई :(372)   →(1326 m) → चंबा (1700)

      3.चंबा → नई टिहरी (झील के पास) 20 km

ऊंचाई: (1700) →(≈850–900 m)

      4.टिहरी → धरासू बेंड > 65 km  

(यहाँ से एक मार्ग यमुनोत्री की ओर और दूसरा गंगोत्री/उत्तरकाशी की ओर जाता है)

      5.धरासू बेंड → उत्तरकाशी > 30 km

 ऊँचाई: उत्तरकाशी (1158 m)

कुल दूरी > हरिद्वार → उत्तरकाशी👇

लगभग 170–180 km , समय: 6–7 घंटे✓✓

2️⃣🚗 उत्तरकाशी से हनुमान चट्टी 🚶यमुनोत्री 

1.उत्तरकाशी → बड़कोट , 80 km

ऊँचाई: उत्तरकाशी (1158 m) → बड़कोट (1220 m)

मार्ग: डबरानी – डामटा – नौगाँव होकर

2.बड़कोट → हनुमान चट्टी , 36 km

ऊँचाई: हनुमान चट्टी (2400 m) । यह जगह टौंस नदी और यमुना नदी संगम के पास है।

3.हनुमान चट्टी → जानकी चट्टी ,  5 - 6 km

ऊँचाई: जानकी चट्टी (2650 m) ।यहाँ तक वाहनों से जाया जा सकता है।

🚶ट्रेक मार्ग 5 - 6 km 

जानकी चट्टी → यमुनोत्री मंदिर ,  5–6 km पैदल/खच्चर/पालकी मार्ग

ऊँचाई: यमुनोत्री (3293 m)

प्रमुख पड़ाव: जानकी चट्टी (2650 m) , फूलचट्टी , जानकी चट्टी से 3–4 km पर सूर्यकुंड (गरम जल) , फिर यमुनोत्री धाम व यमुना जी का उद्गम ।

उत्तरकाशी से यमुनोत्री दूरी 🚗122 km 🚶6 km 

3️⃣ उत्तरकाशी से गंगोत्री

🚗सड़क मार्ग 

1.उत्तरकाशी → सुक्की टॉप 15 km ,  उत्तरकाशी (1158 m) → सुक्की टॉप (≈1900 m) । यहाँ से भागीरथी घाटी के सुंदर दृश्य दिखाई देते हैं।

2.सुक्की टॉप → भटवारी , 10 km

ऊँचाई: भटवारी (≈2000 m) ,भटवारी एक छोटा कस्बा है।

3.भटवारी → हर्षिल घाटी , 28 km

ऊँचाई: हर्षिल (2620 m) ,यह जगह सेब बागानों और भागीरथी नदी के लिए प्रसिद्ध है।

4.हर्षिल → धराली → मुखबा गाँव , 12 km

ऊँचाई: धराली (≈2680 m), मुखबा (≈2620 ,m)।

मुखबा गाँव शीतकाल में गंगोत्री मंदिर की पूजा का स्थान होता है।

5.मुखबा → गंगोत्री धाम ,  25 km

ऊँचाई: गंगोत्री (3048 m) ।

यहाँ भागीरथी नदी के उद्गम "गोमुख" की ओर ट्रेक शुरू होता है।

👉 इस प्रकार उत्तरकाशी से गंगोत्री लगभग 100 km की दूरी पर है और पूरी यात्रा भागीरथी नदी के किनारे-किनारे होती है।

3️⃣.1️⃣गंगोत्री से गौमुख , तपोवन और केदारताल की तीर्थ यात्रा भी करनी चाहिए ⤵️


ऊपर स्लाइड में गंगोत्री से 14km भोजवासा , भोजवासा से 10 - 12 km गौमुख - तपोवन यात्रा करके वापिस भोजवासा लौटना तथा अगले दिन भोजवासा से 11 km एक तरफ केदारताल की यात्रा की जाती है जो अति कठिन यात्रा है। अगले दिन केदारताल से वापिस भोजवासा लौटना होता है।भोजवासा से गंगोत्री लौट कर विश्राम करने के बाद अगले दिन केदारनाथ जी की यात्रा पर निकलना होता है⤵️

4️⃣ गंगोत्री धाम से केदारनाथ धाम 

🚗> गंगोत्री → उत्तरकाशी ,100 km

ऊँचाई: गंगोत्री (3048 m) → उत्तरकाशी (1158 m)

मार्ग: हर्षिल – भटवारी – सुक्की टॉप

1.उत्तरकाशी → टेहरी (नई टेहरी/चंबा),75 km

ऊँचाई: टेहरी (≈800–900 m)

2.टेहरी → श्रीनगर (गढ़वाल) , 105 km

ऊँचाई: श्रीनगर (≈560 m) , अलकनंदा नदी के किनारे-किनारे

3.श्रीनगर → रुद्रप्रयाग , 35 km

ऊँचाई: रुद्रप्रयाग (895 m), यहाँ अलकनंदा व मंदाकिनी का संगम है।

4.रुद्रप्रयाग → सोनप्रयाग , 70 km

ऊँचाई: सोनप्रयाग (1829 m)मे

5.सोनप्रयाग → गौरीकुंड , 5 km

ऊँचाई: गौरीकुंड (1982 m)

🚶 ट्रेक मार्ग 

गौरीकुंड → केदारनाथ धाम ,16 km 

ऊँचाई: केदारनाथ (3583 m)

प्रमुख पड़ाव : गौरीकुंड > जंगलचट्टी > भीमबली > रामबाड़ा > लिनचोली > बेसकैंप > केदारनाथ मंदिर⤵️


👉 कुल मिलाकर गंगोत्री से केदारनाथ तक लगभग 400–410 km सड़क मार्ग + 16–18 km ट्रेक करना होता है।

 5️⃣ केदारनाथ से बद्रीनाथ धाम 

🚶 ट्रेक : केदारनाथ → गौरीकुंड

दूरी: 16 km पैदल/खच्चर/पालकी

ऊँचाई: केदारनाथ (3583 m) → गौरीकुंड (1982 m)

🚗 सड़क मार्ग 

1.गौरीकुंड → (5 km )सोनप्रयाग →(70km) रुद्रप्रयाग

ऊँचाई: रुद्रप्रयाग (895 m)

रुद्रप्रयाग >  अलकनंदा व मंदाकिनी का संगम।

2.रुद्रप्रयाग → (33km) कर्णप्रयाग

ऊँचाई: कर्णप्रयाग (860 m)

कर्ण प्रयाग > अलकनंदा व पिंडर नदी संगम।

3.कर्णप्रयाग →(21km) नंदप्रयाग
ऊँचाई: नंदप्रयाग (914 m)

नंदप्रयाग > अलकनंदा व नंदाकिनी नदी संगम।

4.नंदप्रयाग → (70km) विष्णुप्रयाग
ऊँचाई: विष्णुप्रयाग (1372 m)

विष्णुप्रयाग >अलकनंदा व धौलीगंगा संगम।

5.विष्णुप्रयाग →(10km) जोशीमठ →+45km)बद्रीनाथ

बद्रीनाथ ऊँचाई: 3133 m

👉 केदारनाथ से बद्रीनाथ तक कुल दूरी लगभग 230–240 km (सड़क) + 16km (ट्रेक) है।

6️⃣  🚗बद्रीनाथ  से हरिद्वार 307 km 


।। ॐ।।