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Friday, September 19, 2014

क्या करूँ ? ये सुनते ही नहीं

** जा रहे थे कहीं , कुछ काम तो था नहीं पर चल पड़ा था , 
यूँ ही । यह सोच कर चला था कि अमुक गाँव में एक मेरे बहुत पुरानें मित्र रहा करते थे ,चलो उनका समाचार ले आते हैं । 
 ** आज से लगभग 50 साल पहले हम लोग एक साथ सामनें वाले गाँवके स्कूल में पढ़ा करते थे , उसी गाँव में वे रहा भी करते थे । 
** अपनें गाँव और उनके गाँव में होगी तकरीबन दो किलो मीटर की दूरी,सोचा कि जब हम गाँव आये ही हैं तो चलो मिल आते
 हैं , अपनें बचपन के साथी से । 
 ** यह बात सन् 1965-66 की है मैं इंजिनीयरिंग में दाखिला लिया था और मेरे मित्र B.Sc. में । उन दिनों हम सब बिना कुछ सोचे समझे ख़ुशी में डूबे रहा करते थे , कितनें प्यारे थे , वे बचपन के दिन ! 
 ** जब उनके मिलनें जा रहा था तब तो ढेर सारे सवाल उठ रहे थे ; यह पूछूँगा , वह पूछूँगा ,वह ऐसा होगा ,उसके बच्चे ऐसे होंगे आदि आदि लेकिन अब तो एक ही बात घूम -घूम कर अन्दर आती रहती है कि ,' यार इन 50 सालों में यह तो मुझे पता नहीं कि हम बदले हैं या नहीं पर दुनिया जरुर बदल गयी ।
 ** मैं एक पीपल - पेड़ के नीचे बैठा था , सुस्ता रहा था और वहाँ की सारी घटनाएँ मेरे दिमाक में घूम रही थी कि इतने में पीछे से कोई मुझे हिला - हिला कर कह रहा था - बाबा ! बाबा ! 
उठो , चलो घर , मैं आप को कहाँ - कहाँ नहीं ढूढा और आप यहाँ बैठे हो ? 
** उस समय मेरी आँखे बंद थी , मैं सोच में पूरी तरह डूबा था , एकाएक आँखें खुल गयी , उस प्यारे बच्चे को देखा और मैं बोलनें ही जा रहा था कि वह पूछ बैठा :--
 # आप रो क्यों रहे हो ? 
 * मैं क्या जबाब देता , मेरे पास कुछ बचा ही न था कि बच्चे को बताता , इतना जरुर बोल पाया कि :-- 
* बेटे ! बचपनकी कुछ सूखी यादें एकाएक हरी हो उठी हैं । 
<> अगले अंक में आगे की बात <> 
~~ ॐ ~~