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Wednesday, September 10, 2014

जीवनको स्वप्न आधारित न होनें दो

<> जीवन निर्मल है और इसमें सत्यकी उर्जा बहती है , इसे स्वप्न आधारित न होनें दें । 
<> भोग निर्मल जीवनका एक साधन है , इसे साध्य न बनायें । <> सच्चाई तो यह है कि भोग आधारित जीवन स्वयं एक स्वप्न है । 
<> और जो इसे ऐसा न समझ कर जी रहे हैं , वे खोज तो रहे हैं सत्यको पर सत्यकी ओर पीठ किये हुए हैं ।
 <> भोगको परम समझ कर जो जी रहे हैं ,वे परमको भी भोगका बिषय समझते हैं और इस सम्बन्धमें उनका तर्क बहुत मजबूत सा दिखता है ।
 <> क्या ले कर आये हैं ? क्या लेकर जाना है ? यह परम सत्य सबको मालूम है लेकिन इसे कोई -कोई अपनें हृदय में बैठा पाता है । 
<> दुखों की एक दवा है ; जो मिल रहा है , उसे प्रभुका प्रसाद समझ कर अपनें दिल से स्वीकारो ।
 <> तुम किसी को न तो कुछ दे सकते हो और न ले सकते हो , यह है ,परम सत्य फिर चौधरी बन कर क्यों घूम रहे हो ? सच्चाई के साथ रहो और सच्चाई में जीवो ।
 <> संसार एक रंग मंच है , जहाँ विभिन्न रूप -रंगों में हम सब हैं ,कठपुतलियों की तरह । सभीं कठपुतलियों की डोर एक उंगली से बधी हैं जो है तो सही पर उसका नाम अनाम है जिसे सब
 अपनें - अपनें नाम से स्मरण करते हैं । 
<> सभीं श्रुतियाँ उस अनाम का गुण गान करती हैं और वह स्वयं गुणातीत है । 
 <> तीन गुण हैं ,तीनों गुणों के भाव उस अनाम से हैं पर उन भावों में वह अनाम नहीं होता । 
<> उस अनामको भावातीत भी कहते हैं ।
 <> सभीं मार्ग अधूरे होते हैं पर एक ऐसे आयाम में पहुँचाते जरुर हैं जहाँ से वह दिखनें लगता है जिसके पास हमें जाना है लेकिन इस सत्य से परदा तब उठता है जब संसार -पाठशाला की साधना पूरी हो चुकी होती है । 
<> जीवो और जीवनको अलमस्ती से भरनें दो , अलमस्ती और जीवनके मध्य मन -बुद्धि की दिवार न बननें दो । 
~~ ॐ ~~