Tuesday, November 18, 2014

दो बूँद आँसू

उनकी आखिरी बात थी ," क्या बताऊँ बेटा , अपनें जीवनका अनुभव और मेरे अनुभव से तुमको मिलेगा भी क्या , अभीं संसार तुमनें कदम ही तो रखा है ? सब्र रखो , धीरे - धीरे संसार तुमको भी डुबो लेगा और तुम्हे तब पता चलेगा कि तुम डूब चुके हो जब निकलनें के सभीं उपाय समाप्त हो चुके होंगे , यही एक गहरा राज गई ,इस संसार का ।
* इंसान आँखें बंद किये सारा जीवन गुजार देता है और जब उसकी आँखें खुलना चाहती है तब खुल नहीं पाती और वह बिचारा , तड़पता हुआ आखिरी श्वास भरता है ।
* जिसका कद दुनिया वालोंके लिए लम्बा दिखता
है ,उस बिचारेका वही कद उसके घर वालोंके लिए एक चीटी के कद से ज्यादा बड़ा नहीं होता । घर में उसकी श्वासें रुक -रुक कर चलती है और ज्योंही उसे मौक़ा मिलता है ,वह घर से बाहर निकल भागता है ।
* रामू काका ज्यादा तो बोल न सके पर जो बोल न सके , उसे उनकी चुप्पी ब्यक्त कर रही थी । * रामू काका बोलते -बोलते एकाएक चुप हो गए , हमें देखते रहे ,दो - एक घडी और हमेशाके लिए बंद हो रही उनकी आँखे दो बूँद आँसू टपकाते हुए सबकुछ कह गयी जिनको समझनें में ही जीवनका राज छिपा दिख रहा है ।
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, October 21, 2014

सोनभद्र की कहानी उसकी जुबानी

^^ सोनभद्र पुर्वाञ्चलका एक नया जनपद जो प्रकृतिका माइका सा है और जो गंगा - सोन दो
बड़ी -बड़ी नदियोंके मध्य बसे हुए होनें पर भी प्यासा है । मैं पिछले 60 साल से इस क्षेत्रको देख रहा हूँ ,यहाँ कौन -कौन से लोग नहीं आते -जाते लेकिन जो आते हैं लगते तो हैं अवतारी पर निकलते हैं महान लुटेरे ।
^^ यहाँ क्या नहीं है ? और क्या है ?
* यह क्षेत्र प्रकृतिका माइका है अतः यहाँ क्या नहीं है का अंदाजा लगाना संभव नहीं । यह क्षेत्र प्रकृति का कुबेर है जहाँ सीमेंट ,अलमुनियम,कोयल , बिजली एवं अन्य प्राकृतिक संपदाओंका अपार भण्डार है पर यहाँ जो लोग रहते हैं , उनके लिए कुछ नहीं है एक पान -सुपाड़ी और तंबाकू को छोड़ कर ।
* यहाँ के लोगों का दिन तम्बाकू के सहारे , रात स्वप्न के सहारे और जीवन मृत्युके इन्तजार में कटता है ।
## कुछ और बातें अगले अंक में ##
~~~ ॐ ~~~

Sunday, October 19, 2014

द्विज शब्द क्या कहता है ?

● द्विज शब्दका इशारा किधर को है ?
 <> अब्यक्त भाव को ब्यक्त करनें की कोशिश में अब्यक्त भावकी अनुभूति से निकला योगी शब्दों की रचना करता है । शब्द जबतक सिद्ध योगी तक रहते हैं , उनमें प्राण होता है लेकिन वही शब्द जब भोगी के मुख से निकलते हैं तब वे मुर्दे होते हैं । 
 <> अब्यक्त भाव की अनुभूति ही समाधि की अनुभूति है जो मनुष्य को मनुष्य से द्विज बनाती है द्विजका अर्थ है वह जिसका दुबारा जन्म हुआ हो ।दुबारा तो सबका जन्म होता है लेकिन द्विजका जन्म गर्भ से नहीं होता , साधना में उसका जो रूपांतरण होता है ,वह उसे द्विज बना देता है ।द्विज ,बुद्ध , प्रज्ञावान ,सिद्ध ये सभीं एक दुसरे के पर्यायवाची शब्द हैं । 
 # भागवत ( 12.4 ) में चार प्रकार की प्रलय बताई गयी हैं जिनमें एक है आत्यंतिक प्रलय। 
* आत्यान्तिक प्रलय क्या है ? 
> आत्मा का ब्रह्म से एकत्व स्थापित होना ही आत्यंतिक प्रलय कहलाती है । आत्मा और ब्रह्म का एकत्व अर्थात :--
 " साधनाके मध्य जब गुण तत्त्वों की ग्रेविटी से साधक बाहर निकलता है तब उसका मन -बुद्धि दर्पण निर्मल हो जाता है । निर्मल मन -बुद्धि दर्पण , आत्मा - व्रह्मके एकत्व को दिखाता है और जो देखनें वाला होता है वह अपनें को शरीर से बाहर देखता है ( out of body experiencing ) और ऐसे को द्रष्टा या साक्षी या बुद्ध कहते हैं ।"
 * द्विज बुद्धका पर्यायवाची शब्द है ।
 ~~~ ॐ ~~~

Tuesday, October 7, 2014

है तो समझदार पर ...

# हम देखते तो बहुत हैं , कभीं -कभीं ऑंखें भी थक जाती हैं पर जो देखते हैं उसके बारे में गंभीरता से सोचते कम हैं । 
# मौसम का पूर्वानुमान मनुष्य को छोड़ कर अन्य सभीं जल -चर , स्थल -चर और नभ -चरों को होता है लेकन मनुष्य विज्ञानका स्वामी होते हुए भी इस बिषय से अनभिज्ञ है ,ऐसा क्यों ? 
# संसारमें एक नज़र डाल कर देखना ,आपको हैरानी होगी यह जानकर , एक मक्खी से लेकर बड़े से बड़े जीव तक , चाहे जीव कितना भी बिशाल देह वाला हो जैसे डाईनासूर , जिराफ , ऊँट या हांथी , इन सभीं अति शुक्ष्म और विशाल काय जीवों के शरीर की रचना कुछ इस तरह से होती है , इनकी नाक जमीन के करीब होती है पर मनुष्य की नाक जमीन से दूर रहती है । क्या कारणों में एक प्रमुख कारण यह नहीं हो सकता , हमें इस बात का बहुत कम ज्ञान हो पाता है , अगले 24 घंटों में कुदरत में क्या घटने वाला है ?
 # साइंस मनुष्य के तर्क की उपज ही और कुदरत तर्कातीत है । 
# फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार प्राप्त मैक्स प्लैंक का कहना है ," आज जब हम वैज्ञानिक मार्ग पर दो कदम आगे चल लेते हैं और पीछे मुड़ कर देखते हैं तब स्वयं को पहली स्थिति से दो कदम पीछे पाते हैं । 
<< जो दिमाक में आये , सोचो ।
 << जो चाहो ,वह करो । 
<> पर प्यारे ! अपनें को कुदरत का ही एक अंग समझो ।
 ~~~ ॐ ~~~

Friday, September 19, 2014

क्या करूँ ? ये सुनते ही नहीं

** जा रहे थे कहीं , कुछ काम तो था नहीं पर चल पड़ा था , 
यूँ ही । यह सोच कर चला था कि अमुक गाँव में एक मेरे बहुत पुरानें मित्र रहा करते थे ,चलो उनका समाचार ले आते हैं । 
 ** आज से लगभग 50 साल पहले हम लोग एक साथ सामनें वाले गाँवके स्कूल में पढ़ा करते थे , उसी गाँव में वे रहा भी करते थे । 
** अपनें गाँव और उनके गाँव में होगी तकरीबन दो किलो मीटर की दूरी,सोचा कि जब हम गाँव आये ही हैं तो चलो मिल आते
 हैं , अपनें बचपन के साथी से । 
 ** यह बात सन् 1965-66 की है मैं इंजिनीयरिंग में दाखिला लिया था और मेरे मित्र B.Sc. में । उन दिनों हम सब बिना कुछ सोचे समझे ख़ुशी में डूबे रहा करते थे , कितनें प्यारे थे , वे बचपन के दिन ! 
 ** जब उनके मिलनें जा रहा था तब तो ढेर सारे सवाल उठ रहे थे ; यह पूछूँगा , वह पूछूँगा ,वह ऐसा होगा ,उसके बच्चे ऐसे होंगे आदि आदि लेकिन अब तो एक ही बात घूम -घूम कर अन्दर आती रहती है कि ,' यार इन 50 सालों में यह तो मुझे पता नहीं कि हम बदले हैं या नहीं पर दुनिया जरुर बदल गयी ।
 ** मैं एक पीपल - पेड़ के नीचे बैठा था , सुस्ता रहा था और वहाँ की सारी घटनाएँ मेरे दिमाक में घूम रही थी कि इतने में पीछे से कोई मुझे हिला - हिला कर कह रहा था - बाबा ! बाबा ! 
उठो , चलो घर , मैं आप को कहाँ - कहाँ नहीं ढूढा और आप यहाँ बैठे हो ? 
** उस समय मेरी आँखे बंद थी , मैं सोच में पूरी तरह डूबा था , एकाएक आँखें खुल गयी , उस प्यारे बच्चे को देखा और मैं बोलनें ही जा रहा था कि वह पूछ बैठा :--
 # आप रो क्यों रहे हो ? 
 * मैं क्या जबाब देता , मेरे पास कुछ बचा ही न था कि बच्चे को बताता , इतना जरुर बोल पाया कि :-- 
* बेटे ! बचपनकी कुछ सूखी यादें एकाएक हरी हो उठी हैं । 
<> अगले अंक में आगे की बात <> 
~~ ॐ ~~

Wednesday, September 10, 2014

जीवनको स्वप्न आधारित न होनें दो

<> जीवन निर्मल है और इसमें सत्यकी उर्जा बहती है , इसे स्वप्न आधारित न होनें दें । 
<> भोग निर्मल जीवनका एक साधन है , इसे साध्य न बनायें । <> सच्चाई तो यह है कि भोग आधारित जीवन स्वयं एक स्वप्न है । 
<> और जो इसे ऐसा न समझ कर जी रहे हैं , वे खोज तो रहे हैं सत्यको पर सत्यकी ओर पीठ किये हुए हैं ।
 <> भोगको परम समझ कर जो जी रहे हैं ,वे परमको भी भोगका बिषय समझते हैं और इस सम्बन्धमें उनका तर्क बहुत मजबूत सा दिखता है ।
 <> क्या ले कर आये हैं ? क्या लेकर जाना है ? यह परम सत्य सबको मालूम है लेकिन इसे कोई -कोई अपनें हृदय में बैठा पाता है । 
<> दुखों की एक दवा है ; जो मिल रहा है , उसे प्रभुका प्रसाद समझ कर अपनें दिल से स्वीकारो ।
 <> तुम किसी को न तो कुछ दे सकते हो और न ले सकते हो , यह है ,परम सत्य फिर चौधरी बन कर क्यों घूम रहे हो ? सच्चाई के साथ रहो और सच्चाई में जीवो ।
 <> संसार एक रंग मंच है , जहाँ विभिन्न रूप -रंगों में हम सब हैं ,कठपुतलियों की तरह । सभीं कठपुतलियों की डोर एक उंगली से बधी हैं जो है तो सही पर उसका नाम अनाम है जिसे सब
 अपनें - अपनें नाम से स्मरण करते हैं । 
<> सभीं श्रुतियाँ उस अनाम का गुण गान करती हैं और वह स्वयं गुणातीत है । 
 <> तीन गुण हैं ,तीनों गुणों के भाव उस अनाम से हैं पर उन भावों में वह अनाम नहीं होता । 
<> उस अनामको भावातीत भी कहते हैं ।
 <> सभीं मार्ग अधूरे होते हैं पर एक ऐसे आयाम में पहुँचाते जरुर हैं जहाँ से वह दिखनें लगता है जिसके पास हमें जाना है लेकिन इस सत्य से परदा तब उठता है जब संसार -पाठशाला की साधना पूरी हो चुकी होती है । 
<> जीवो और जीवनको अलमस्ती से भरनें दो , अलमस्ती और जीवनके मध्य मन -बुद्धि की दिवार न बननें दो । 
~~ ॐ ~~

Wednesday, September 3, 2014

भीगे नैना -1

<> मैं उनसे बोल था ; आप आये हो ,अच्छी बात है। लेकिन कुछ ऐसा न बोल देना कि मैं रो पडू ।क्योंकि पिछले 16 सालसे ये आँसू बहते ही रहे हैं चाहे कोई इन्हें देखा हो या न देखा हो ।ये अब कुछ दिनों से बंद हैं , क्या पता , ये क्यों बंद हैं ? पर वे कहाँ चुप रहनें वाले ? 
# वे अपनीं आदत से लाचार हैं 
 * और 
# मैं अपनें हृदयका गुलाम हूँ ।
 ** मेरी मजबूरी एक पल भी चैन की श्वास नहीं भरनें देती और उनकी मजबूरी दुसरे को रुला कर उनके दिलको ठंढ़क
 पँहुचाती है ।
 ~~ हे राम ~~