^^ सोनभद्र पुर्वाञ्चलका एक नया जनपद जो प्रकृतिका माइका सा है और जो गंगा - सोन दो
बड़ी -बड़ी नदियोंके मध्य बसे हुए होनें पर भी प्यासा है । मैं पिछले 60 साल से इस क्षेत्रको देख रहा हूँ ,यहाँ कौन -कौन से लोग नहीं आते -जाते लेकिन जो आते हैं लगते तो हैं अवतारी पर निकलते हैं महान लुटेरे ।
^^ यहाँ क्या नहीं है ? और क्या है ?
* यह क्षेत्र प्रकृतिका माइका है अतः यहाँ क्या नहीं है का अंदाजा लगाना संभव नहीं । यह क्षेत्र प्रकृति का कुबेर है जहाँ सीमेंट ,अलमुनियम,कोयल , बिजली एवं अन्य प्राकृतिक संपदाओंका अपार भण्डार है पर यहाँ जो लोग रहते हैं , उनके लिए कुछ नहीं है एक पान -सुपाड़ी और तंबाकू को छोड़ कर ।
* यहाँ के लोगों का दिन तम्बाकू के सहारे , रात स्वप्न के सहारे और जीवन मृत्युके इन्तजार में कटता है ।
## कुछ और बातें अगले अंक में ##
~~~ ॐ ~~~
Tuesday, October 21, 2014
सोनभद्र की कहानी उसकी जुबानी
Sunday, October 19, 2014
द्विज शब्द क्या कहता है ?
● द्विज शब्दका इशारा किधर को है ?
<> अब्यक्त भाव को ब्यक्त करनें की कोशिश में अब्यक्त भावकी अनुभूति से निकला योगी शब्दों की रचना करता है । शब्द जबतक सिद्ध योगी तक रहते हैं , उनमें प्राण होता है लेकिन वही शब्द जब भोगी के मुख से निकलते हैं तब वे मुर्दे होते हैं ।
<> अब्यक्त भाव की अनुभूति ही समाधि की अनुभूति है जो मनुष्य को मनुष्य से द्विज बनाती है द्विजका अर्थ है वह जिसका दुबारा जन्म हुआ हो ।दुबारा तो सबका जन्म होता है लेकिन द्विजका जन्म गर्भ से नहीं होता , साधना में उसका जो रूपांतरण होता है ,वह उसे द्विज बना देता है ।द्विज ,बुद्ध , प्रज्ञावान ,सिद्ध ये सभीं एक दुसरे के पर्यायवाची शब्द
हैं ।
# भागवत ( 12.4 ) में चार प्रकार की प्रलय बताई गयी हैं जिनमें एक है आत्यंतिक प्रलय।
* आत्यान्तिक प्रलय क्या है ?
> आत्मा का ब्रह्म से एकत्व स्थापित होना ही आत्यंतिक प्रलय कहलाती है । आत्मा और ब्रह्म का एकत्व अर्थात :--
" साधनाके मध्य जब गुण तत्त्वों की ग्रेविटी से साधक बाहर निकलता है तब उसका मन -बुद्धि दर्पण निर्मल हो जाता है । निर्मल मन -बुद्धि दर्पण , आत्मा - व्रह्मके एकत्व को दिखाता है और जो देखनें वाला होता है वह अपनें को शरीर से बाहर देखता है ( out of body experiencing ) और ऐसे को द्रष्टा या साक्षी या बुद्ध कहते हैं ।"
* द्विज बुद्धका पर्यायवाची शब्द है ।
~~~ ॐ ~~~
Tuesday, October 7, 2014
है तो समझदार पर ...
# हम देखते तो बहुत हैं , कभीं -कभीं ऑंखें भी थक जाती हैं पर जो देखते हैं उसके बारे में गंभीरता से सोचते कम हैं ।
# मौसम का पूर्वानुमान मनुष्य को छोड़ कर अन्य सभीं जल -चर , स्थल -चर और नभ -चरों को होता है लेकन मनुष्य विज्ञानका स्वामी होते हुए भी इस बिषय से अनभिज्ञ है ,ऐसा क्यों ?
# संसारमें एक नज़र डाल कर देखना ,आपको हैरानी होगी यह जानकर , एक मक्खी से लेकर बड़े से बड़े जीव तक , चाहे जीव कितना भी बिशाल देह वाला हो जैसे डाईनासूर , जिराफ , ऊँट या हांथी , इन सभीं अति शुक्ष्म और विशाल काय जीवों के शरीर की रचना कुछ इस तरह से होती है , इनकी नाक जमीन के करीब होती है पर मनुष्य की नाक जमीन से दूर रहती है । क्या कारणों में एक प्रमुख कारण यह नहीं हो सकता , हमें इस बात का बहुत कम ज्ञान हो पाता है , अगले 24 घंटों में कुदरत में क्या घटने वाला है ?
# साइंस मनुष्य के तर्क की उपज ही और कुदरत तर्कातीत है ।
# फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार प्राप्त मैक्स प्लैंक का कहना है ," आज जब हम वैज्ञानिक मार्ग पर दो कदम आगे चल लेते हैं और पीछे मुड़ कर देखते हैं तब स्वयं को पहली स्थिति से दो कदम पीछे पाते हैं ।
<< जो दिमाक में आये , सोचो ।
<< जो चाहो ,वह करो ।
<> पर प्यारे ! अपनें को कुदरत का ही एक अंग समझो ।
~~~ ॐ ~~~
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