आसन से समाधि तक की
योग यात्रा
इस यात्राके निम्न 06 चरण हैं 👇
⬆️नीचे से ऊपर की योग यात्रा के 06 चरणों को ऊपर दिखाया गया है ।
पतंजलि योग सूत्रों के आधार पर इन 06 चरणों की परिभाषाएँ निम्न हैं ⬇️
अब ऊपर परिभाषित 06 चरणों को विस्तार से देखते हैं ⬇️
01 :
सन्दर्भ सूत्र : साधन पाद : 46 - 48
" स्थिर सुखं आसनं "
जिस देह की स्थिति में स्थिर सुख मिलता हो , पतंजलि उसे आसन कहते हैं ।
आसन सिद्धि प्राप्त योगी सहज यत्न से अनंत पर एकाग्रता साध सकता है ।और वह योगी द्वंद्व मुक्त होता है ।
02
सन्दर्भ सूत्र :साधन पाद : 49 - 53
● रेचक , पूरक , कुम्भक और बाह्य कुम्भक , प्राणायाम के चार अंग हैं ।
● रेचक , पूरक और कुम्भक देश , काल और संख्या की दृष्टि से दीर्घ एवं सूक्ष्म होने चाहिये ।
◆रेचक -पूरक को छोड़ सीधे आगे बढ़ जाना अर्थात सीधे कुम्भक में पहुँच जाना हठ प्रदीपिका में केवली प्राणायाम नाम से जाना जाता है । इस श्वास रहित स्थिति को पतंजलि बाह्य कुम्भक प्राणायाम कहते है ।
●प्राणायाम के चारों अंगों की सिद्धि पर प्रकाश के ऊपर पड़ा अज्ञान - आवरण क्षीण हो जाता है ।
# प्राणायाम सिद्धि से मन में धारण की योग्यता आती है।
सन्दर्भ सूत्र :साधन पाद : 54 - 55
★ इंद्रियों का स्वरुप बिषय स्वरूपाकार न रह कर चित्त स्वरूपाकार हो जाता है ।
★प्रति + अहार >प्रत्याहार
अर्थात अपने अहार की ओर पीठ करना
● प्रत्याहार सिद्धि से इन्द्रियां पूर्णरूपेण बश में रहती हैं और वे अपनें - अपनें बिषयों से आकर्षित नहीं होती ।
04
" देशबंध : चित्तस्य धारणा "
सन्दर्भ सूत्र :विभूति पाद : 1
# आसन - प्राणायाम की सिद्धि से चित्त में धारण की ऊर्जा भरती है
# अवरोध रहित किसी सात्त्विक आलंबन पर चित्त का देर तक स्थिर रहना , धारणा है ।
◆ शब्द , अर्थ और ज्ञान - ये 03 एक आलंबनके अंग हैं । इन में से किसी एक से चित्त जा बध जाना , धारणा है ।
05
" तत्र प्रत्यय एकतानता , ध्यानं "
सन्दर्भ सूत्र :विभूति पाद : 2
बिना किसी रुकावट धारणाका देर समय तक बने रहना , ध्यान कहलाता है ।
यहाँ निम्न सन्दर्भ सूत्रों को देखें ⬇️
ऊपर के 16 सूत्रों का सार 👇
# दो प्रकार की समाधि है⬇️
1 - सबीज समाधि ( सम्प्रज्ञात समाधि )
2 - निर्बीज समाधि ( ( असम्प्रज्ञात समाधि )
1.2 : सबीज समाधिके प्रकार ⬇️
वितर्क , बिचार , आनंद और अस्मिता
➡️ किसी सात्त्विक स्थूल आलंबन पर लंबे समय तक ध्यान में डूबे रहने का फल , वितर्क समाधि है ।
➡️ किसी सूक्ष्म सात्त्विक आलंबना जैसे स्व श्वास पर , किसी मन्त्र पर या जप आदि पर ध्यान का लंबे समय तक स्थिर बने रहने से विचारानुगत समाधि मिलती है ।
➡️ लंबे समय तक किसी सात्त्विक आलंबन पर ध्यान जब लंबे समय तक टिका रहता है तब हृदय में एक अकारण आनंद ली लहर उठने लगती है और यह आनंद समाधि का रूप ले लेता है और इसे आनंदानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं ।
मन , बुद्धि और अहँकार को मिला कर चित्त कहलाता है। जब चित्त पुरुष प्रकाश से प्रकाशित होता है अर्थात जब चित्त बासना मुक्त होता है तब चित स्वयं को पुरुष और पुरुष स्वयं को चित्त समझने लगते हैं ।
➡️ जब चित्त माध्यम से किसी सात्त्विक आलंबना के सूक्ष्मतम बिषय पर गहरा ध्यान में डूबा जाता है तब पारिजात मणि जैसा पारदर्शी चित्त सर्व शून्यावस्था में आ जाता है और समाधि घटित हो जाती है
👌अभ्यास से अपर वैराग्य और अपर वैराग्य जब पर वैराग्य में बदलता है तब सबीज समाधि घटित होती है
समाधि पाद - 19
👌 ऐसे योगी जो अपने पिछले जन्म में विदेह और प्रकृति लय प्राप्त कर चुके होते हैं और उनका देह छूट जाता है तब ऐसे योगी अपनें वर्तमान जीवन का प्रारंभ सबीज समाधि से प्रारंभ करते हैं ।
समाधि पाद सूत्र : 46 - 47
सबीज समाधि से आध्यात्मिक शांति मिलतीं है लेकिन यह समाधि भी आलंबनमुक्त नहीं होती , बीज रूप में संस्कार रहते हैं । जब संस्कार भी समाप्त हो जाते हैं तब निर्बीज या असम्प्रज्ञात समाधि मिलती है जो कैवल्य का द्वार खोलती है और कैवल्य , मोक्ष में उतार देता है ।
समापत्ति क्या है ?
एक से अधिक का एक स्थान और एक समय एकत्रित होना , समापत्ति कहलाता है ।
समापत्तियाँ सम्प्रज्ञात समाधि के अंग हैं । वितर्क और विचार माध्यम से आलंबन के शब्द , अर्थ और ज्ञान के भ्रम में जब समाधि घटित होती है तब उसे समापत्ति कहते हैं । उदहारण >
जैसे यदि ॐ आलंबन पर धारणा और ध्यान घट रहा हो और उस समय ॐ शब्द , ॐ अर्थ और ॐ के ज्ञान में से किसी एक पर नहीं अपितु तीनों के भ्रम में समाधि घटित होती है तो उसे समापत्ति कहेंगे । यदि वह वितर्क हो तो समापत्ति सवितर्क या निर्वितर्क हो सकती है और यदि वह विचार पर है तो सविचार - निर्विचार हो सकती है ।
पतंजलि सूत्र आधारित समाधि के प्रकार ⬇️
~~◆◆ ॐ ◆◆~~
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