उत्तराखंड के तीन पवित्र तीर्थ जहां की ऊर्जा सीधे समाधि में पहुंचाती है👇
ऊपर व्यक्त तीन तीर्थ में ध्यान शीघ्रता से घटित होने लगता है और ध्यान की उच्च भूमि मिलते ही समाधि भी घटित हो जाती है। इन पवित्र तीर्थोंकी यात्रा प्रारंभ करने से पहले इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइड में वैज्ञानिकों द्वारा ध्यान में डूबे साधक के मस्तिष्क की स्थित पर किए गए शोध के सार को देख लेते हैं….
अब इन तीर्थों की यात्रा प्रारंभ होती है ….
ऐसा क्या हैं इन मंदिरों में की यहां कुछ घड़ी रुकते ही अंतःकरण रूपांतरित होने लगता है ? इनकी यात्रा पर निकलने से पहले इन तीन तीर्थों से परिचित हो लेते हैं ..
1- कसार शक्तिपीठ
कसार शक्तिपीठ के संबंध में कुछ मान्य व्यक्तियों के अनुभव ⤵️
लामा अनागारिक गोविन्द
एक यूरोपीय मूल के बौद्ध साधु थे जिन्होंने कसार देवी क्षेत्र में लंबे समय तक निवास किया। उन्होंने हिमालयी आध्यात्मिक अनुभवों पर कई पुस्तकें भी लिखीं। उनका मानना था कि यह स्थान ध्यान के लिए अत्यंत अनुकूल “ऊर्जा-क्षेत्र” है।
वाल्टर इवांस-वेंट्ज़
प्रसिद्ध पुस्तक The Tibetan Book of the Dead के लेखक हैं। उन्होंने कसार देवी क्षेत्र में रहकर हिमालयी आध्यात्मिक परंपराओं का अध्ययन किया। इस क्षेत्र को उन्होंने रहस्यमय और साधना के लिए विशेष माना।
सिस्टर निवेदिता
उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांतों में अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों (जहाँ कसार देवी भी आती है) के आध्यात्मिक वातावरण का उल्लेख किया है। उनके लेखन में हिमालय को “आत्मिक जागरण का क्षेत्र” बताया गया है।
टिमोथी लीरी (हार्वर्ड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक)
उन्होंने कसार देवी को “neuroelectric energy vortex” कहा। उनका विचार है कि यहां “बिना किसी दवा के ब्रह्मांड से जुड़ने जैसा अनुभव” होता है।उन्होंने माना कि यहाँ की प्राकृतिक विद्युत-चुंबकीय स्थिति मानव चेतना को प्रभावित कर सकती है।
डी.एच. लॉरेंस
प्रसिद्ध साहित्यकार, जिन्होंने इस क्षेत्र में समय बिताया
हिमालय की इस शांति और ऊर्जा को रचनात्मक प्रेरणा का स्रोत माना ।
कुछ योगियों ने यहाँ ध्यान के दौरान गहरी मानसिक शांति और मस्तिष्क तरंगों (gamma, theta) में बदलाव का अनुभव बताया
कसार देवी परिसर के बारे में लिखने/अनुभव करने वाले लोग तीन प्रकार के हैं…
संत और योगी → इसे ध्यान और आत्मबोध का स्थल मानते हैं
दार्शनिक और कलाकार → इसे चेतना और रचनात्मकता को बढ़ाने वाला स्थान बताते हैं
वैज्ञानिक दृष्टिकोण → यहाँ कुछ असामान्य भू-चुंबकीय गुण होने की संभावना मानते हैं, पर पूर्ण प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
👉 यही कारण है कि कसार देवी को…
“आध्यात्म + विज्ञान + रहस्य” ,बतीनों का संगम कहा जाता है।
2.जागेश्वर शिव क्षेत्र दर्शन
अल्मोड़ा से 35 km पर स्थित 1870 m ऊंचाई पर स्थित है।
यह शिव ऊर्जा परिसर अल्मोड़ा - पिथौरागढ़ मार्ग पर है।
परिसर में प्रवेश करते ही घंटियों की ध्वनि, देवदार की खुशबू के साथ मनमोहक ठंडी हवा का स्पर्श मिलता है जो तन में आध्यात्मिक रोमांच पैदा करता है। पत्थर के शिखर शैली (Nagara style) में बने छोटे - बड़े समान आकार के मंदिर एक दूसरे से सटे हुए बनाए गए हैं जिनकी संख्या लगभग 124 है। परिसर का वातावरण इतना शांत है कि लोग इसे “प्राकृतिक ध्यान स्थल” भी मानते हैं। चारों तरह से देवदार के घने जंगल से घिरा हुआ,बीच में बहती जटा गंगा की धारा के कारण यह परिसर किसी प्राचीन सिद्ध ऋषि के आश्रम की स्मृति में ले जाता है । यह तीर्थ “भक्ति + आध्यात्मिक ऊर्जा” का केंद्र है।
3.पताल भुवनेश्वर दर्शन
मार्ग : 01
अल्मोड़ा → बागेश्वर → गंगोलीहाट → पताल भुवनेश्वर
दूरी ~120 km
मार्ग :02
पिथौरागढ़ → थल → गंगोलीहाट → पाताल भुवनेश्वर :
दूरी ~ 90-100 km , गंगोलीहाट से लगभग 15 km
पाताल भुवनेश्वर एक रहस्यमय, प्राकृतिक गुफा मंदिर है
जहाँ भूगोल, आध्यात्मिकता और पौराणिक मान्यताएँ एक साथ मिलती हैं। यह कोई सामान्य मंदिर नहीं, बल्कि
चूना पत्थर (limestone) की गुफा है,गुफा के अंदर प्राकृतिक शिवलिंग ,विभिन्न देवी-देवताओं जैसी आकृतियाँ
स्टैलेग्माइट-स्टैलेकटाइट संरचनाएँ हैं।
पूरी गुफा लगभग 90–100 फीट गहराई तक जाती है अतः
बुजुर्ग या कमज़ोर घुटनों वाले लोगों को सावधानी रखनी चाहिए।अंदर जाने के लिए लोहे की चेन पकड़कर उतरते हैं
गुफा का प्रवेश संकरा एवं ढलानदार है और अंदर नमी और फिसलन रहती है। लगभग 80–100 सीढ़ियाँ नीचे गुफा में उतरना पड़ता है। इसे “पाताल लोक का प्रवेश द्वार” माना जाता है। यहां की ऊर्जा आंतरिक कंपन और रोमांच पैदा करती है ।
(ऐसे सात छोटे कुंड हैं)
पाताल भुवनेश्वर गुफा की प्राकृतिक आकृतियाँ चूना पत्थर (limestone) पर पानी के रिसाव, खनिज जमा होने और लाखों वर्षों की प्रक्रिया से बनी हैं। ये stalactite (छत से नीचे लटकती) और stalagmite (जमीन से ऊपर उठती) आकृतियाँ हैं, जिन्हें स्थानीय गाइड और भक्त विभिन्न देवी-देवताओं, पौराणिक प्रतीकों और घटनाओं से जोड़ते हैं।
मुख्य प्राकृतिक आकृतियों का वर्णन:
शेषनाग
गुफा के प्रवेश द्वार पर और फर्श पर शेषनाग की विशाल आकृति दिखती है। उसके फन, लंबे नुकीले दांत और कंकाल जैसी संरचना स्पष्ट दिखाई देती है। मान्यता है कि गुफा शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और वह पृथ्वी, स्वर्ग तथा पाताल को संभाले हुए है।
भगवान शिव की जटाएँ
छत से लटकती विशाल stalactites शिव की जटाओं जैसी लगती हैं। इनसे लगातार पानी की बूँदें टपकती रहती हैं, जिसे गंगा का रूप माना जाता है। ये जटाएँ पूरे गुफा में बिखरी हुई हैं।
शिवलिंग
गुफा के अंदर एक छोटा प्राकृतिक शिवलिंग है, जो धीरे-धीरे बढ़ रहा है। मान्यता है कि जब यह शिवलिंग गुफा की छत को छू लेगा, तब कलयुग का अंत हो जाएगा। अमरनाथ गुफा जैसी आकृति भी दिखती है।
त्रिमूर्ति
तीन stalagmite आकृतियाँ तीन सिरों जैसी लगती हैं — ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति। इनके ठीक ऊपर छत से तीन stalactites लटकती हैं।
गणेश जी
गुफा में आदि गणेश या गणेश की मूर्ति जैसी आकृति है। एक जगह सिर रहित बालक का शरीर भी दिखता है, जिसे गणेश जी का रूप माना जाता है।
अन्य आकृतियां
#;ऐरावत हाथी
दीवारों और फर्श पर हाथी के सिर, कान, सूंड और दांतों जैसी आकृतियाँ हैं। कुछ जगह इसे इंद्र के ऐरावत हाथी के 100 पैरों से जोड़ा जाता है।
# सप्तऋषि मंडल ,अष्टकमल ,ब्रह्मा जी का हंस ,कुबेर, यम, वरुण, लक्ष्मी, गरुड़ आदि की आकृतियाँ।
# द्वार : रामद्वार, पापद्वार, धर्मद्वार, मोक्षद्वार जैसे प्रतीकात्मक द्वार।
# वासुकि नाग, काल भैरव की जीभ जैसी आकृतियाँ।
ये सभी आकृतियाँ पूरी तरह प्राकृतिक हैं।
~~ ॐ ~~
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