Saturday, August 1, 2015

दोस्तीऔर इंसाफ

दोस्ती और इन्साफ सिकुड़ते चले जा रहे है संभवतः कल ये एक कल्पना बन कर रहा जाएँ

प्याला

जिस प्यालेनें भरी मुहब्बत , 
वह प्याला कैसे रूठ गया ? 
जिस प्याले के,दम पर मैं , 
दिन - रात अकेले ,चलता था । 
वह प्याला ,मेरे दिल का प्याला , 
आज न जानें क्यों , रूठ गया ?

Thursday, June 11, 2015

जीवन सरक रहा ...

जीवन सरक रहा
उम्र ढल रही
सोच कमजोर पड़ रही
आहिस्ता आहिस्ता ।
तन झुक रहा
मन फ़ैल रहा
बुद्धी सिकुड़ रही
आहिस्ता आहिस्ता ।।
देह के नौ द्वारों से
बाहर जानें को
एक अजनवी है तैयार
आहिस्ता आहिस्ता ।।।
वक़्त तो गुजर गया
तन भी सिकुड़ गया
देखा तो सारा संसार
पर अपनें को ही भूल गया ।।।।

Tuesday, May 12, 2015

वह बोल रही थी .......

वह बोल रही थी ......
~ एक मुझे भी दो , पर सुनता कौन है ?
* भीड़ नियंत्रणसे बाहर हो रही थी । लोग एक दूसरे पर चढ़ रहे थे । पुलिश भी कुछ करनें में असफल हो रही थी । उस अपार भीड़ में उसकी आवाज कौन सुन सकता था पर वह आवाज लगाए ही जा रही थी कि एक बश एक और वह भी एक ही बार मुझे भी चाहिए । * अंत में वहाँ चल रहे कार्यक्रमको रोक दिया गया और यह कहा गया कि कुछ दिन बाद पुनः यह कार्यक्रम चलाया जाएगा और उस कार्यक्रम में जनताका पूरा सहयोग मिलना चाहिये ।
* पूरी तरह आगे को झुकी हुयी वह लगभग रही होगी 90 साल की । * मायुश होकर मन ही मन बुदबुदाती हुयी हाँथ में एक छोटा डंडा थामे गाँव की दादी अम्मा उस स्थान से चल पड़ी थी अपनें झोपड़े मई ओर ।
* कुछ दूरी पर एक गाडी खड़ी थी । वह गाडी थी प्रेस वालों की ।
* एक प्रेस वाले को जिज्ञासा हुयी कुछ पूछनें को और वह पूछ ही बैठा कि दादी ! आप यहाँ क्या करनें आई थी ?
* दादी बोली , बेटा ! मुझे भी एक चाहिए था सो सोची थी कि चलते हैं एक हम भी ले आते हैं , उसकी जरुरत तो एक दिन सबको पड़ती ही है , क्या पता ठीक समय पर मिले - न मिले ।
* फिर मन ही मन बुदबुदाती दादिजब आगे चलनें लगी तब वह प्रेस वाला पूछ बैठा :---
# दादी ! वह क्या चीज है जिसे आप लेने गयी थी और न पा सकी ?
** दादी बोली :-----
~~ कफ़न और क्या ? ~~
बेटा ! वैसे तो मेरे झोपड़े में सब कुछ है ,बस यही एक चीज न थी सोची ,चलते है और ले आते है बाज़ार से । रास्ते में हिचकू भाई मिले और बोले , क्या करेगी वाजार जा के , यहीं गाँव के नुक्कड़ पर सरकार मुफ़्त बाट रही है , सबको एक -एक मिलेगा , जिनकी उम्र हो चुकी है , जा और मन पसंदगी का ले आ सो चली आई थी पर ------ वह बोल रही थी कि एक कफ़न मुझे भी देना , बेटा , पर वहाँ सुनता कौन है ?
~~~ ॐ ~~~

Sunday, March 1, 2015

मर्म

मर्म और मलहम <> 
क्या रिश्ता है , इन दोनों में ? 
* वह जो मर्मको समझता है , वहीं सही मलहम लगानेंकी तकनीकको समझ सकता है । 
* जितनें मरहम लगानें वाले आपको मिलेंगे , उनमें शायद ही कोई ऐसा मिले जो अपनें दिल से चोट की गाम्भीरताको पकड़नेकी कोशिश भी करता हो , वरना तो , चोट पर मिर्च छिड़कनेंके बहानें ही लोग मरहमकी डिब्बी लेकर आपके पास आते हैं । 
* चोटकी गंभीरताको दिल से समझना , और आँखें बंद करके दिलसे उस चोटको सहलाना, मरहम लगानेंसे उत्तम परिणाम देता है ।
 * वह जो मर्मको समझता है , उसे भौतिक मरहम की कोई जरुरत नहीं । 
* चोटकी गंभीरताको देखते ही हृदय से उपजे और आँखोंसे टपके दो बूँद आँसू , परम मरहम का काम करते हैं । 
~~~ ॐ ~~~