Sunday, April 28, 2024

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय - 1 सार


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय - 01 में अर्जुन की बातों को सुनने के बाद अध्याय - 2 श्लोक - 2 में प्रभु श्री कृष्ण अर्जुन से पूछते हैं ,  हे अर्जुन ! इस असमय में  तुम्हें मोह कैसे हो गया ? अर्जुन की भाषा - भाव को देखते हुए प्रभु इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अर्जुन मोह के दलदल में डूब रहा है और यदि यह मोह मुक्त हुए बिना युद्ध में उतरता है तो इसकी पराजय होनी ही है अतः युद्ध प्रारंभ पूर्व इसका मोह मुक्त होना आवश्यक है । 

गीता का प्रारंभ प्रभु द्वारा प्रयोग किए गए मोह शब्द से होता है और अर्जुन अपनें श्लोक : 18.73 में कहते हैं , हे प्रभु ! अब मेरा मोह नष्ट हो गया है , मैं अपनें पूर्व की स्मृति में लौट आया हूं , संशय रहित हूं और आप की आज्ञा का पालन करने को तैयार हूं ।

 इस प्रकार यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि श्रीमद्भगवद्गीता तामस गुण में प्रमुख तत्त्व मोह को निर्मूल करने की एक अचूक औषधि है ।

।। ॐ ।।