जीवन सरक रहा
उम्र ढल रही
सोच कमजोर पड़ रही
आहिस्ता आहिस्ता ।
तन झुक रहा
मन फ़ैल रहा
बुद्धी सिकुड़ रही
आहिस्ता आहिस्ता ।।
देह के नौ द्वारों से
बाहर जानें को
एक अजनवी है तैयार
आहिस्ता आहिस्ता ।।।
वक़्त तो गुजर गया
तन भी सिकुड़ गया
देखा तो सारा संसार
पर अपनें को ही भूल गया ।।।।