Sunday, November 1, 2015
Wednesday, October 7, 2015
Tuesday, September 22, 2015
ध्यान
Thursday, August 20, 2015
वह आएगा
Saturday, August 1, 2015
प्याला
Friday, July 31, 2015
Thursday, June 11, 2015
जीवन सरक रहा ...
जीवन सरक रहा
उम्र ढल रही
सोच कमजोर पड़ रही
आहिस्ता आहिस्ता ।
तन झुक रहा
मन फ़ैल रहा
बुद्धी सिकुड़ रही
आहिस्ता आहिस्ता ।।
देह के नौ द्वारों से
बाहर जानें को
एक अजनवी है तैयार
आहिस्ता आहिस्ता ।।।
वक़्त तो गुजर गया
तन भी सिकुड़ गया
देखा तो सारा संसार
पर अपनें को ही भूल गया ।।।।
Tuesday, May 12, 2015
वह बोल रही थी .......
वह बोल रही थी ......
~ एक मुझे भी दो , पर सुनता कौन है ?
* भीड़ नियंत्रणसे बाहर हो रही थी । लोग एक दूसरे पर चढ़ रहे थे । पुलिश भी कुछ करनें में असफल हो रही थी । उस अपार भीड़ में उसकी आवाज कौन सुन सकता था पर वह आवाज लगाए ही जा रही थी कि एक बश एक और वह भी एक ही बार मुझे भी चाहिए । * अंत में वहाँ चल रहे कार्यक्रमको रोक दिया गया और यह कहा गया कि कुछ दिन बाद पुनः यह कार्यक्रम चलाया जाएगा और उस कार्यक्रम में जनताका पूरा सहयोग मिलना चाहिये ।
* पूरी तरह आगे को झुकी हुयी वह लगभग रही होगी 90 साल की । * मायुश होकर मन ही मन बुदबुदाती हुयी हाँथ में एक छोटा डंडा थामे गाँव की दादी अम्मा उस स्थान से चल पड़ी थी अपनें झोपड़े मई ओर ।
* कुछ दूरी पर एक गाडी खड़ी थी । वह गाडी थी प्रेस वालों की ।
* एक प्रेस वाले को जिज्ञासा हुयी कुछ पूछनें को और वह पूछ ही बैठा कि दादी ! आप यहाँ क्या करनें आई थी ?
* दादी बोली , बेटा ! मुझे भी एक चाहिए था सो सोची थी कि चलते हैं एक हम भी ले आते हैं , उसकी जरुरत तो एक दिन सबको पड़ती ही है , क्या पता ठीक समय पर मिले - न मिले ।
* फिर मन ही मन बुदबुदाती दादिजब आगे चलनें लगी तब वह प्रेस वाला पूछ बैठा :---
# दादी ! वह क्या चीज है जिसे आप लेने गयी थी और न पा सकी ?
** दादी बोली :-----
~~ कफ़न और क्या ? ~~
बेटा ! वैसे तो मेरे झोपड़े में सब कुछ है ,बस यही एक चीज न थी सोची ,चलते है और ले आते है बाज़ार से । रास्ते में हिचकू भाई मिले और बोले , क्या करेगी वाजार जा के , यहीं गाँव के नुक्कड़ पर सरकार मुफ़्त बाट रही है , सबको एक -एक मिलेगा , जिनकी उम्र हो चुकी है , जा और मन पसंदगी का ले आ सो चली आई थी पर ------ वह बोल रही थी कि एक कफ़न मुझे भी देना , बेटा , पर वहाँ सुनता कौन है ?
~~~ ॐ ~~~